वज्द और रक़्स
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article regarding wajd and raqsh
महफिले सिमा में वज्द व रक़्श क़ुरआन शरीफ व अहादीस शरीफ की रौशनी में : वज्द एक ऐसा रूहानी जज़्ब हे जो अल्लाह की तरफ से बातिनी तौर पर इन्शान पर वारिद होता हे जिसके नतीजे में ख़ुशी या गम की कैफियत पैदा होती हे इस जज़्ब के वारिद होने से बातिन की बैअत या हालत बदल जाती हे और उसके अंदर रुजू इल्लल्लाह का शौक पैदा होता हे गोया वज्द एक क़िस्म की राहत हे ये उस शख्श को हासिल होती हे जिस की शिफ़ात नफशे मबलुग हो और उसकी नज़रे अल्लाह ताला की तरफ लगी हुई हो।
वज्द बाज़ एहले ईमान में से ऐसे लोगो को होता हे के जब वोह क़ुरआन पाक की तिलावत या नात शरीफ सुनते हे या वहदानियत या तस्सवूफ का कलाम या फिर किसी औवलिया अलाह का लिखा हुवा कोई कलाम सुनते हे या किसी अल्लाह वाले की महफ़िल में ज़िक्रे अल्लाह करते हे तो ख़ुसूसियते इलाही या मोहब्बते इलाही या मोहब्बते रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम की वजह से या या औवलिया अल्लाह की मनक़बत या तारीफ़ या तौसीफ सुनने की वजह से एक खश कैफियत तारी होती हे, ख़ुसूसन जब अल्लाह या अल्लाहवालो का ज़िक्र किया जाता हे तो ज़किरिन पे अनवार व तजल्लियात का वुरुद होता हे जिस की वजह से इन के जिस्म मुख्तलिफ हरकात करने लगते हे। कभी वह रोने लगते हे कभी भागने लगते हे कभी बेहोश हो जाते हे कभी इधर कभी उधर कभी आगे कभी पीछे जुकते और गिरते हे और कभी इनके जिस्म तरपने लगते हे ये तमाम हरकात गैर इख़्तेयारी होती हे उस वक़्त इन्शान का अपने जिस्म पे कोई काबू नहीं होता। उसकी मिसाल ऐसे हे के जैसे इन्शान को जब छींक या खांसी वगैरा आती हे तो वह इन्हे काबू नहीं कर पाता क्यूंकि ये गैर इख़्तेयारी अफआल हे ऐसे ही वज्द की कैफियत भी गैर इख़्तेयारी होती हे।
कशफ़ुल मेहजूब में हज़रत दाता गंजबख्श (र अ) फरमाते हे " वज्द की कैफियत बयान नहीं की जा सकती ,क्यूंकि ये वह गम हे जो मोहब्बत में मिलता हे इस लिए बयान से बाहिर हे निज वज्द तालिब और मतलूब के दरमियान एक राज़ हे जिसे बयान करना मतलूब की ग़ीबत के बराबर हे, वज्द आरिफो की सिफत हे"। (कशफ़ुल मेहजूब)
तवाजद : कशफ़ुल मेहजूब में हज़रत दाता गंजबख्श (र अ) फरमाते हे "तवाजद वज्द लाने में एक तकलीफ होता हे और ये इनामात व शवाहदे हक़ को दिल के हुज़ूर पेश करना हे और मेहजूब के विसाल का ख़याल और इन्शानी आरज़ू का जोश में आना हे। हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया " जो किसी कौम से मुसाबेहत पैदा करता हे वह उसी से होता हे " आगे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया " जब तुम क़ुरआन पढ़ो तो रोया करो अगर रोना न आये तो तकलीफ से रोओ" और ये हदीस तवाजद के मुबह होने पर गवाह हे। (कशफ़ुल मेहजूब) शेख शहाबुद्दीन सोहरवर्दी (र अ) अवारिफुल मआरिफ़ में फरमाते हे " ज़िक्र और फिक्र से वज्द को हासिल करना तवाजद कहलाता हे।
अल्लामा अब्दुल गनी नातबी (र अ) फरमाते हे "तवाजद ये हे के एक शख्श को हक़ीक़त में वज्द हासिल न हो लेकिन वो तकलीफ से वज्द को इख़्तियार करता हे , इस में शक नहीं के तवाजद में हक़ीक़ी वज्द वालो से मुसाबेहत इख़्तियार करता हे और ये न सिर्फ जाइज़ हे बल्कि शरअन मतलूब हे " . हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया " जिसने किसी क़ौम की मुसाबेहत इख़्तियार की वह उनमे से हे ".( ﺍﻟﺤﺪﯾﺚ ﺍﻟﻨﺴﺪﯾﮧ ﺝ۲ ﺹ ٥۲٥ )
वज्द की इक़्साम : वज्द की वैसे तो बहुत सी इक़्साम हे जैसे रोना,रक़्श करना ,भागना ,तरपना। कई बार तो ऐसा होता हे के आदमी वज्द में होता हे जबकि देखनेवालों को ऐसा ही लगता हे के वह बिलकुल नार्मल हालत में हे और कई बार तो आदमी वज्द की हालत में ऐसी हरकते करता हे के देखनेवालों को ऐसा लगे के वह कोई ड्रामा कर रहा हे लेकिन वह ऐसा जान बुज कर हरगिज़ नहीं करता बल्के गलबए अनवारे खुदावन्दी और गलबए खुसुसियाते खुदावन्दी की वजह से ये हरकात होती हे। किसी बुजुर्गने वज्द के बारे में फ़रमाया जिस का मफ़हूम अर्ज़ करता हु के " जब वज्द का असर ज़बान पर होता हे तो बन्दा रोता हे, चेह्चहाता हे , मुंह से मुख्तलिफ अलफ़ाज़ अदा करता हे और जब वज्द का असर हाथो पर होता हे तो वह कपडे फारता हे मुंह पर तमाचे लगाता हे और कभी हाथ को सीने पर मारता हे और जब वज्द का असर पाउ पर होता हे तो रक़्श करता हे।
वज्द की चन्द अक्साम बयान की जाती हे, १-कुल बदन की हरक़त और इज़तराब। २- बाज़ बदन की हरक़त मसलन लटाइफ़ की हरक़त। ३-रक़्श करना। ४- मुंह से कुछ अलफ़ाज़ का जारी होना मसलन हु, हु, हा, हा, आह, उफ़, अल्लाह, अल्लाह वगैरा (और या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम भी मुंह से जारी होना वल्लाह मैंने खुद ऐसा देखा हे)। ५- जारो कतार रोना। ६- कपडे फारना,वगैरा। ७- ऐसा रक्श करना के जिससे जिस्म के आजा टूट जाए और ऐसे वज्द से मौत का खतरा होता हे और कभी कभी वाक़ेअ भी हो जाता हे, जैसा के हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम सहाबा ए किराम (र अ) में सेकड़ो की तादाद में वज्द की वजह से फौत हो जाते थे, और हुज़ूर गौसुल आज़म (र अ) की मजालिस में भी २ से लेकर ७० जनाजे उठते थे। ८ -नारा लगाना और कभी नारा लगाकर बेहोश हो जाना। ९- नमाज़ की हालत में वज्द बेइख़्तेयारी,बेहोश हो जाना बाज़ अवक़ात खारिजे नमाज़ वज्द तारी होना।
वज्द पर एतराजात : वज्द की वैसे तो ऊपर मुख्तलिफ अक़साम बयान किये गए हे लेकिन मुन्किरीने वज्द सबसे ज्यादा सूफिया के वज्द पर एतराजात करते हे और उसी सिलसिले में फुकहा की कुछ इबारत पेश करते हे जिन में रक़्श और वज्द को नाजाइज़ कहा गया हे, लेकिन यहाँ ये वजाहत करनी जरूरी हे के फुक़हा और उलमा ने सूफिया के वज्द को नाजाइज़ नहीं कहा बल्कि ऐसे रक़्श को नाजाइज़ कहा हे जो किसी दुनयावी ग़रज़ के लिए हो या फिर दिखलावे के लिए हो या फिर ऐसा रक़्श जिसमे औरतो जैसी हरक़त हो या फिर किसी गैर मर्द या औरत के साथ किया जाये या फिर ऐसा रक़्श जो दुनयावी फ़ाहेशा गानो के साथ किया जाये जैसा के फिल्मो में आज कल होता हे या फिर ऐसा रक़्श जिसमे मर्द घुंघरू बांध कर और नशा कर के और साथ में औरते खुले बाल करके मर्द के साथ रक़्श कर रही हो या नाच रही हो इसी तरह के रक़्श को उलमा ने नाजाइज़ कहा है।।।।
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