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कृष्ण जन्माष्टमी

     श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की सभी को बधाई और शुभकामनाएं.... मुझे श्रीकृष्ण अच्छे लगते हैं... इसलिए भी क्योंकि उन्हें लेकर अभी उतनी डरावनी राजनीति नहीं हुई, दंगें फसाद नहीं हुए। पहले राम भी अच्छे लगते थे, अब उनके "जय श्रीराम" के नारे से डर लगता है... श्रीकृष्ण अन्य देवी देवताओं से इसलिए भी भिन्न हैं क्योंकि उनके द्वारा "भागवत गीता" रची गई, मैंने पढ़ी है , मेरे घर की लाइब्रेरी में मौजूद है, मुझे पसंद है... ‌ श्रीकृष्ण इसलिए भी अलग हैं क्योंकि उनकी महिमा में हिंदुओं से अधिक मुसलमानों ने हिंदी, उर्दू, ब्रजभाषा, और अन्य भाषाओं में दोहे लिखे हैं... सबसे महत्वपूर्ण कि मुसलमान होते हुए मुगलकाल में इन सभी लोगों ने कृष्ण लीला लिखी...जैसे  1-सैयद इब्राहिम अर्थात "रसखान" ब्रजभाषा में इन्होंने कृष्ण की लीला में ऐसा दोहे लिखे कि इन्हें ही "रस की खान" कहा जाने लगा और अन्ततः वह कालजई "रसखान" हो गये। उनकी रचनाएँ, जैसे "मानुष हौं तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन" और "धूर भरे अति शोभित स्याम जू",  सैयद इब्राहिम को श्रीकृष्ण स...

कर्बला

कर्बला का वाकया समझने के लिए आपको पैगंबर मुहम्मद ﷺ के बाद उनके उत्तराधिकारी ख़लीफाओं को सबसे पहले समझना होगा। उनमें सबसे पहले ख़लीफा बने हजरत अबू बक्र सिद्दीक रज़ि• (632-634 ईस्वी) इसके बाद हजरत उमर इब्ने अल-खत्ताब रज़ि• (634-644 ईस्वी) फ़िर हजरत उस्मान इब्ने अफ्फान रज़ि• (644-656 ईस्वी) , और हजरत अली इब्ने अबू तालिब रज़ि• (656-661 ईस्वी)             हिंदू भाई समझ लें कि इब्ने का अर्थ होता है पुत्र                       अर्थात रमेश पुत्र सुरेश  हजरत अली रजि• के बाद मुआविया इब्ने अबू सुफियान ने 661 ईस्वी में इस्लाम की खिलाफत संभाली जिसके साथ उमय्यद खलीफा वंश की शुरुआत हुई। यहां तक ख़लीफा चुनने के लिए आपस में राय मशविरा होता था और सबकी सहमति से ख़लीफा चुन लिया जाता था और इसी तरह सबके राय मशविरे से इस्लाम के शुरुआती सभी उपरोक्त ख़लीफा चुने गए थे। मुआविया इब्ने अबू सुफियान के पिता अबू सुफ़ियान बिन हरब ने पैगंबर मुहम्मद ﷺ के प्रारंभिक मिशन (610-630 ईस्वी) के दौरान कुरैश के नेता के रूप में इस्लाम और हज़र...

वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरण

SANGH HIRED MUSLIM LEADERS FOR NEW GEOPOLITICAL ORDER: BARRISTER OWAISI IN BAHRAIN सौ साल के बाद बदली दुनिया मे, संघ की सरकार ने झक मार कर मुस्लिम नेताओं का सराकर में बहाली कर तुष्टिकरण शुरू कर दिया। उर्दु नाम वालो को याद होगा, हम चुनाव के समय कहते थे कि अपना नेता पैदा करो और कांग्रेस, समाजवादी या मायावती के पार्टी में दरी बिछाना बंद करो, क्योंकि दुनिया बदल गई है, अब हर पार्टी तुम को “घर से बोला कर नेता बनाये गी, तुम को मंत्री बनाये गी” *आज की खबर है कि एमआईएम के फायर ब्रांड नेता विश्व प्रख्यात, दाढ़ी-टोपी धारी, धाराप्रवाह बोलने वाले बैरिस्टर ओवैसी को बहरीन भेजा गया है ताकि वह भारत का पक्ष रखें। नतीजा क्या होगा, इस पर हम टिका-टिप्पणी नहीं करें गें!! मेरा कहना है, उर्दु नाम वालों आप भारतीय गंदी राजनीति को तीन तलाक़ दिजये और पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दिजये, विदेश जाईये और बदले geopolitical order का लाभ उठाईये, अपना व्यवसाय किजये। *जिस तरह से संघ की सरकार ने मुस्लिम नेता बहाल करना शुरू किया है, यह आप को व्यवसाय भी अब करने देगें। दंगा-नवमी कर जीडीपी जलाये गें तो 80% बहुसंख्यकों का नुक़सान हो गा...

तीसरा विश्वयुद्ध और भारत

तीसरा विश्वयुद्ध और भारत ------------------------------------------ कितना सम्भव है तीसरा विश्वयुद्ध.. क्या होंगे भारत के दांव?  पहला विश्वयुद्ध इसलिए हुआ था, क्योकि देशों की सीमाओं का मान नही था। यूरोप के रजवाड़ो ने एक दूसरे के इलाके चुराने की कोशिश की। दूसरा भी इसीलिए हुआ, क्योकि जर्मनी ने दूसरे देशों पर कब्जे का लोभ किया। लेकिन इसके बाद 80 साल, शान्ति से गुजरे है।  वजह- इलाकाई सम्प्रभुता के सम्मान की सभ्यता पनपी।  ●● अब भूटान हो, या जापान, शक्तिवान हो या धनवान.. कोई किसी के इलाके न छीनता था। अधिक से अधिक पिठ्ठू सरकारें बनवाने की कोशिश होती, जो आपके हित साधे। अमेरिका इस व्यवस्था मे ब्रोकर और पहरेदार बनता। लेकिन ईराक, अफगानिस्तान, सीरिया, यूक्रेन में सीधे सेनाऐं उतरीं। पूतिन ने यूक्रेन मे कब्जा किया। चीन को ताइवान चाहिए, फिर अरुणाचल और अक्साई चिन। खुद अमेरिका दरोगा से डाकू बन चुका है।ट्रंप कनाडा चाहिए, गल्फ ऑफ मैक्सिको, ग्रीनलैंड और गाजा चाहिए। हम भी अखंड भारत बनाकर कर 8-10 देशो पर कब्जा चाहते ही है। युद्धप्रिय दक्षिणपन्थ को यूरोप मे जनसमर्थन मिल रहा है। एर्डाेगन अलग ताल ...

करबला दोस्ती सिखाती है।

जो किसी रोज़ इज़रायली आकर कहें, "ग़ज़ा के बच्चों को क्यों रोते हो, वो सब तो शहीद हैं?" जो किसी रोज़ कोई दक्षिणपंथी सवाल करे "लिंचिंग में मरने वाले का मलाल कैसा? शहादत तो तुम्हारी विरासत है?" जो कोई दंगाई, या फर्ज़ी एन्काउन्टर स्पेशलिस्ट आकर कह दे, "मौत बरहक़ है, भला ये रोना-पीटना किस बात का? जवाब क्या होगा?  ज़ाहिर है, हम कहेंगे मरने वाले को नहीं रोते हैं, ज़ुल्म को रो रहे हैं? क्या हम नहीं समझते कि शहीद का रोना है या नाइंसाफी का? मरसिया मौत का है या नाहक़ ज़्यादती का?  बस जिस दिन ये बात दिल में बैठ जाए कि छह महीने के बच्चों का सिन शहादत समझने के लिए नहीं होते है इसलिए जंग में बच्चे क़त्ल नहीं किए जाते। जब ये यक़ीन हो जाए कि क़ुर्बानी के जानवर के भी हक़ूक़ हैं, उसे भूखा, प्यासा ज़िबह नहीं किया जाता तो फिर इंसान को ऐसे आलम में कैसे मारा जा सकता है। जब दिल ये तस्लीम कर ले कि कमज़ोर से कमज़ोर शख़्स के घर की बहू-बेटियों की भी इज़्ज़त है, किसी के घर की नामूस बाज़ारों में बेपर्दा नहीं फिराई जातीं। बस उसी रोज़ दिल नर्म हो जाते हैं और आंखें नम होना सीख जाती हैं।  जब ये...

कर्बला क्या सिखाती है?.

ज़ुहैर इब्ने क़ैन अल बजली कूफा के संभ्रांत लोगों में गिने जाते थे। पेशे से व्यापारी थे और उस वक़्त के अक़ीदे के लिहाज़ से उस्मानी। उस्मानी, यानी वो लोग जो मानते थे कि अली इब्ने अबु तालिब ने अपने से पहले ख़लीफा रहे उस्मान बिन अफ्फन के हत्यारों के साथ ढीलाई बरती और इंसाफ नहीं किया। बहरहाल, ज़ुहैर हज करके लौट रहे थे। रास्ते में उनका क़ाफिला एक जगह ठहरा। उनसे कुछ ही दूरी पर हुसैन इब्ने अली के परिवार के ख़ेमे लगे थे। हुसैन हज अधूरा छोड़कर कूफा की तरफ निकले थे। अपने भाई मुहम्मद ए हनफिया को लिखे एक पैग़ाम में उन्होंने कहा कि मैं नहीं चाहता कि मक्का या मदीना की ज़मीन पर ख़ूंरेज़ी हो और ये इल्ज़ाम मेरे सिर आए। बहरहाल, इमाम हुसैन ने अपने साथियों से ज़ुहैर के क़ाफिले के बारे में दरयाफ्त किया। उन्होंने पता करके बताया कि, कूफे का कोई मौअतबर शख़्स है, हज करके लौट रहा है। इमाम हुसैन ने अपने भाई अब्बास इब्ने अली को बुलाया और कहा कि उस क़ाफिले के सालार के पास जाएं और उनसे कहें कि हुसैन बिन अली आपसे मिलना चाहते हैं।  अब्बास बिन अली भाई का पैग़ाम लेकर पहुंचे। ज़ुहैर ने उनसे नाम-पता पूछा और आने का मक़...

करबला क्या सिखाती है?

कर्बला में ख़ुद इमाम हुसैन के अलावा कम से कम छह सहाबिए रसूल इमामे आली मक़ाम की नुसरत में शहीद हुए हैं। इनमें हबीब इब्ने मज़ाहिर अल-असदी, मुस्लिम इब्ने औसजा अल असदी, अनस बिन हारिस अल कहिली, अब्दुल रहमान इब्ने अब्द रब अल अंसारी, अब्दुल्लाह इब्ने यक़तर अल हिमायरी, किनाना बिन अतीक़ अल तबलाग़ी, अम्मार बिन अबि सलामा अल दलानी अल हमदानी प्रमुख हैं। ये सभी कूफा शहर के वासी हैं। इसी कूफा शहर में और भी कई सहाबी और ताबइन हैं। इनमें कर्बला से पहले कम से कम दो मुस्लिम इब्ने अक़ील के साथ शहीद हुए और बग़ावत के इल्ज़ाम में क़रीब दर्जन भर गिरफ्तार कर लिए गए। बाक़ी ख़ौफज़दा होकर घरों में बैठ गए। नबी ए करीम के सहाबियों में दो ऐसे भी हैं जिनके सिर क़त्ले हुसैन में शरीक होने का गुनाह है। एक, अब्दुर रहमान बिन अब्ज़ा अल क़ुज़ाई और अबु अब्दुल क़ुद्दूस शबस बिन रिबी अल तमीमी। ये दोनों इब्ने ज़ियाद के लश्कर में हैं और क़त्ले हुसैन में पेश-पेश हैं। इन दोनों से मंसूब कई हदीस सही ए सित्ता में दर्ज हैं। इनमें अनस बिन हारिस का मसला बड़ा दिलचस्प है। वो मुहद्दिस हैं बद्र के ज़माने के सहाबी हैं। अनस बद्र और हुनैन की जंग ...