रिश्तेदारी में शादी की हक़ीक़त वेदों से

महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे
मामा और सगी बुआ
की बेटी थीं, और स्वयं
श्रीकृष्ण जी ऐसे विवाह के पक्ष मे थे .
कृष्ण जी ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह
अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से
करवाया था ! अर्जुन सुभद्रा के सगे फुफेरे भाई थे, और सुभद्रा अर्जुन
की सगी ममेरी बहन
थीं, नीचे लिखे प्रमाणों से ये बात
भली प्रकार सिद्ध होती है :-
1- वसुदेव एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और
माता का नाम मारिषा था।
*. ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे।
पांडवों की माता कुंती वसुदेव
की सगी बहन थी ।
वसुदेव
2- पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन
की बेटी और वसुदेव की बहन
थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने
यहाँ रखा। इससे उनका नाम ‘कुंती’ पड़ गया,
कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ
थीं। कुन्ती को इन्द्र के अंश से अर्जुन
का जन्म हुआ।
कुन्ती
3- सुभद्रा कृष्ण की बहिन जो वसुदेव
की कन्या और अर्जुन
की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई
बलराम इनका ब्याह दुर्योधन से करना चाहते थे पर कृष्ण के
प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र
अभिमन्यु , महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा हैं।
सुभद्रा
अर्जुन और सुभद्रा के विवाह की यही बात
भागवत पुराण से भी सिद्ध होती है
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-9 . Paath-24. Shlok-
28-29 . Page-534/535 ]
इसके अलावा एक अन्य उदाहरण भी कज़िन मैरिज
का यहाँ मिलता है
……..विराट नरेश की एक
बेटी थी जिसका नाम उत्तरा था, और एक
बेटा था जिसका नाम उत्तर था. अर्जुन के बेटे अभिमन्यु का विवाह
उत्तरा से हुआ जिससे उनके यहाँ एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम
परिक्षित रखा गया . परिक्षित ने अपने मामा उत्तर
की बेटी इरावती से विवाह किया ।
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-1 . Paath-16 . Shlok-
2 . Page- 63 ]
और सुनिए……. मेरा मानना है कि मेरे उत्तर भारत के ये हिंदू भाई
मुस्लिमों द्वारा रक्त सम्बन्धियों से विवाह के चलन को इसलिए
बुरा समझते हैं, क्योंकि न ये हिन्दू भाई अपने इतिहास और धर्म
को सही से जानते हैं और न ही अपने
ही देश के और अपने ही धर्म के
निवासियों के भिन्न भिन्न प्रकार के रीति रिवाज़ों को जानते
हैं …..
उत्तर भारत मे तो किसी कारणवश हिन्दू भाईयों ने कज़िन
मैरिज की इतनी लाभदायक प्रथा को त्याग
दिया लेकिन हमारे ही देश के तीन
राज्यों कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु यानि पूरे दक्षिण भारत
मे हिन्दू जातियों मे ही बड़े पैमाने पर अपने कज़िन्स और
सगे चाचा आदि से शादी करने का चलन है …. और आप
जानते ही नहीं …..
ब्रह्मा ने अपनी ही पुत्री से विवाह किया सरस्वती से और बहुत है
मध्य प्रदेश में एक गोंड जाती में दादी से पोते की शादी करवाते है हिन्दू
यम-यमी संवाद
[जब बहन (यमी), अपने भाई (यम) के सामने रखती है ‘संभोग-प्रपोज’]
ऋग्वेद के ‘दशम-मण्डल’ में ‘यम’ और ‘यमी’, जिनमे ‘भाई-बहन’ के साथ ‘पति-पत्नी’ का रिश्ता हैं | ‘यमी’ अपने पति-भाई ‘यम’ के समक्ष कामेच्छा पूर्ति का आग्रह करती है, मगर उसका भाई नंपूसक होने के कारण अपनी बहिन-पत्नी का गर्भधारण करवाने में असमर्थ हैं। मगर कामातुर ‘पत्नी-बहिन’ ताने देते हुए, अपने ‘पति-भाई’ को संबंध बनाने के लिए जोर देती है। मगर प्राचीन “ब्राह्मणी-आर्य” परंपरा के अनुसार एक नामर्द-भाई, यदि संभोग के बावजूद भी अपनी ‘भोगिनी-पत्नी*” का गर्भ धारण करवाने में असफल रहता है, तब देवता-अश्विनीकुमारों का श्राप लग सकता है, जिसका ज्ञान उसके भाई (यम) को हो जाता है।
अतः पति-भाई (यम) अपनी बहिन-पत्नी (यमी) को “नियोग प्रथा” के अनुसार किसी अन्य पुरुष से ‘गर्भधारण’ करवाने की आज्ञा देता है ।
▬ प्रस्तुत है ‘यम-यमी’ (भाई-बहिन) के बीच संवाद : –
यमी:- “हे यम ! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है, कौन देख रहा है ?
फिर कौन पुरुष इस बात को दूसरे से कह सकेगा ? यह दिन मित्र देवता का स्थान है, यह दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरे अभिमत के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम, मुझे अनेक कर्मों वाले मनुष्यों से सम्बन्ध हेतु किस प्रकार कहते हो ?
-मेरी इच्छा है कि पति को शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान होकर मैं अपने पति (यम) को अपनी देह उसी प्रकार अर्पित करूँ जैसे पहिये गतिशील मार्ग में संलिष्ट होते है, उसी प्रकार मैं होऊं |”
यम : (अपनी बहन से ) :“हे यमी ! देवदूत बराबर विचरण करते रहते हैं, वे सदा सतर्क रहते है, इसलिए- ‘हे काम की ईच्छा वाली (पत्नी), अब तू मुझे छोड़ कर अन्य किसी की पत्नी बन और शीघ्रता से जा कर उसके साथ रथ-चक्र के सामान संलिप्त हो |
संभवत: आगे चलकर ऐसे ही दिवस-रात्रि आयें जब बहन अपने बंधुत्व को पाने लगेंगी; अतः अभी ऐसा नहीं होता |
हे यमी ! तू सेवन-समर्थ अन्य पुरुष के लिए अपना हाथ बढ़ा और मुझे छोड़ कर अभी उसे ही अपना पति बनने की कामना कर |”
यमी : (अपने भाई (यम) का यह का यह उत्तर सुन कर भी चुप नहीं होती, बल्कि वह एक बार फिर अपने भाई को ताना देते हुए कहती है) :-
“वह बन्धु कैसा, जिसके विद्यमान रहते ‘भगिनी’ इच्छित कामना से विमुक्त रह जाए, वह कैसी ‘भगिनी’ जिसके समक्ष ‘बंधु’ संतप्त हो ?
इसलिए तुम मेरी इच्छानुसार आचरण करो |”
यम : (फिर इनकार करते हुए कहता है) :“हे यमी ! मैं तेरी कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता | अब तू मुझे छोड़ कर अन्य पुरुष से इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर. मैं तेरे भार्यात्व की कामना नहीं करता |
ल हे यमी ! जब एक काम में अशक्त (गर्भाधान करवाने में असमर्थ पुरुष) भाई अपनी भगिनी का गर्भ धारण नहीं करवा करतां|
अतः मैं अकाम्य-पुरुष (Gay) ऐसा करूँ तो यह कर्म मेरे ह्रदय, मन और प्राण का भी नाश कर देगा |”
यह सुन कर तो मानों ‘यमी’ बिलकुल निराश ही हो गई दिखती है, वह कहती है :- “हे यम ! तेरी दुर्बलता पर मुझे दु:ख है. शायद तेरा मन मुझ में नहीं है, मैं तेरे ह्रदय को नहीं समझ सकी. वह किसी अन्य स्त्री से सम्बंधित होगा |”
अंत में यम यह कह कर अपनी बहन से पीछा छुड़ाता है :-
“हे यमी ! रस्सी जैसे अश्व में युक्त होती है, वृत्ति जैसे वृक्ष को जकड़ती है, वैसे ही तू अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले होवो और फिर तू अत्यंत कल्याण वाले सुख को प्राप्त हो.
-इन संवादों के आधार पर कहा जा सकता है की विदेशी-ब्राहमणार्यों में भारतागमन से पूर्व काम-संबंधों में किसी प्रकार की बंदिशें नहीं थी,अपितु पिता-पुत्री, भाई-बहिन, दादा-पोत्री, बहु-ससुर आदि में काम-सम्बन्ध निर्बाध रूप से होते थे | इन लोगों ने विवाह के संस्कार भारतागमन के बाद यहाँ से सीखे थे |
सगे भाई बहन बन सकते है ‘पति-पत्नी’ : हिन्दू धर्म का कड़वा सच वेंदो में लिखा ह
वेदों को भुदेवताओ द्वारा ज्ञान और विज्ञान का भंडार कह कर सारी दुनियाँ में प्रचारित किया जा रहा है| इसकी सच्चाई को जानने विदेशी भी संस्कृत का अध्यायन कर रहे है | नतीजा उन्हें भी पता चल जाएगा की वेदों कितने पानी में है | कुछ उदहारण निचे देखिये …….???
**वेदों में याम और यमी आपस में भाई बहन है इन दोनों की अश्लीलता देखिये ……….. ” क्या एक भाई बहन का पति नही बन सकता ….. मै वासना से अधीन होकर यह प्रार्थना करती हू कि तुम मेरे साथ एक हो जाओ और रमण करो ….. वाह रे ज्ञान के भंडार …….!!!!! वेदों के हिमायतियों को भाई बहन का त्यौहार **रक्षा बंधन ** से दूर ही रहना ठीक होगा |
***इसके साथ ही वेदों की कुछ ऋचाओं , में देवता उपस्थित है , कुछ में नही | कुछ में पुजारी उपस्थित है कुछ में नही | किसी ऋचा में देवता की स्तुति की गई है , तों किसी ऋचाओं में केवल याचना | कुछ में प्रतिज्ञाए की गई है , तों कुछ ऋचाओं में श्राप दिए गए है | कुछ ऋचाओं में दोषारोपण किया गया है और कुछ में विलाप किया गया है | कुछ ऋचाओं में इन्द्र से शराब और मांसाहार के लिए प्रार्थना की गई है |
वेदों में यह विभिन्नताए यह प्रमाणित कराती है की ये ऋचाए भिन्न -भिन्न ऋषियों ( 99% ब्राहमणों ) की रचना है | और हर ऋषि का अपना एक देवता है जिससे वह ऋषि अपनी इच्छा पूर्ति की प्रर्थना करता है | वेदों में न कोई आध्यात्म है, न कोई ज्ञान विज्ञान ,और न कोई नैतिकता |बल्कि अश्लीलता और पाखण्ड ,शराब पीने और मांसाहार करने का भरपूर बोलबाला | कोई महामूर्ख ही वेदों को ज्ञान -विज्ञान का भंडार कह सकते है |
अपनी बेटी से बलात्कार करने वाला, जगत रचयिता : ब्रह्मा
‘ब्रह्मा’शब्द के विविध अर्थ देते हुए श्री आप्र्टे के संस्कृत-अंग्रेजी कोष में यह लिखा है- पुराणानुसार ब्रह्मा की उत्पति विष्णु की नाभि से निकले कमल से हुई बताई गई है उन्होंने अपनी ही पुत्री सरस्वती के साथ अनुचित सम्भोग कर इस जगत की रचना की पहले ब्रह्मा के पांच सर थे,किन्तु शिव ने उनमें से एक को अपनी अनामिका से काट डाला व अपनी तीसरी आँख से निकली हुई ज्वाला से जला दिया. श्रीमद भगवत, तृतीय स्कंध, अध्याय १२ में लिखा है—

वाचं……………..प्रत्याबोध्नायं ||२९|| अर्थात : मैत्रेय कहते है की हे क्षता(विदुर)!हम लोगों ने सुना है की ब्रह्मा ने अपनी कामरहित मनोहर कन्या सरस्वती की कामना कामोन्मत होकर की ||२८|| पिता की अधर्म बुद्धि को देखकर मरिच्यादी मुनियों ने उन्हें नियमपूर्वक समझाया ||२९||क्या यह पतन की सीमा नहीं है.? इससे भी ज्यादा लज्जाजनक क्या कुछ और हो सकता है.?#मुस्लिमो_के_ममेरी_चचेरी_खलेरी_बहनों_से_शादी_पर_बवेला_करने_वाले_पढ़े_अपनी_औकात
मुसलमान और अंतर्जातीय विवाह
भारत के हिन्दू भाई अक्सर
मुस्लिमो द्वारा चचेरी,ममेरी, मौसेरी,
फुफेरी कज़िन के साथ विवाह
की प्रथा को बड़ी गिरी हुई नजर
से देखते हैं, और इस बात को लेकर मुस्लिमों पर गन्दे कटाक्ष
भी करते हैं, पर जहां तक मैं जानता हूं तो वो ये कि हर
धर्म ने इस विवाह की अनुशंसा की है,
महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे
मामा और सगी बुआ
की बेटी थीं, और स्वयं
श्रीकृष्ण जी ऐसे विवाह के पक्ष मे थे .
कृष्ण जी ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह
अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से
करवाया था ! अर्जुन सुभद्रा के सगे फुफेरे भाई थे, और सुभद्रा अर्जुन
की सगी ममेरी बहन
थीं, नीचे लिखे प्रमाणों से ये बात
भली प्रकार सिद्ध होती है :-
1- वसुदेव एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और
माता का नाम मारिषा था।
*. ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे।
पांडवों की माता कुंती वसुदेव
की सगी बहन थी ।
वसुदेव
2- पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन
की बेटी और वसुदेव की बहन
थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने
यहाँ रखा। इससे उनका नाम ‘कुंती’ पड़ गया,
कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ
थीं। कुन्ती को इन्द्र के अंश से अर्जुन
का जन्म हुआ।
कुन्ती
3- सुभद्रा कृष्ण की बहिन जो वसुदेव
की कन्या और अर्जुन
की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई
बलराम इनका ब्याह दुर्योधन से करना चाहते थे पर कृष्ण के
प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र
अभिमन्यु , महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा हैं।
सुभद्रा
अर्जुन और सुभद्रा के विवाह की यही बात
भागवत पुराण से भी सिद्ध होती है
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-9 . Paath-24. Shlok-
28-29 . Page-534/535 ]
इसके अलावा एक अन्य उदाहरण भी कज़िन मैरिज
का यहाँ मिलता है
……..विराट नरेश की एक
बेटी थी जिसका नाम उत्तरा था, और एक
बेटा था जिसका नाम उत्तर था. अर्जुन के बेटे अभिमन्यु का विवाह
उत्तरा से हुआ जिससे उनके यहाँ एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम
परिक्षित रखा गया . परिक्षित ने अपने मामा उत्तर
की बेटी इरावती से विवाह किया ।
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-1 . Paath-16 . Shlok-
2 . Page- 63 ]
और सुनिए……. मेरा मानना है कि मेरे उत्तर भारत के ये हिंदू भाई
मुस्लिमों द्वारा रक्त सम्बन्धियों से विवाह के चलन को इसलिए
बुरा समझते हैं, क्योंकि न ये हिन्दू भाई अपने इतिहास और धर्म
को सही से जानते हैं और न ही अपने
ही देश के और अपने ही धर्म के
निवासियों के भिन्न भिन्न प्रकार के रीति रिवाज़ों को जानते
हैं …..
उत्तर भारत मे तो किसी कारणवश हिन्दू भाईयों ने कज़िन
मैरिज की इतनी लाभदायक प्रथा को त्याग
दिया लेकिन हमारे ही देश के तीन
राज्यों कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु यानि पूरे दक्षिण भारत
मे हिन्दू जातियों मे ही बड़े पैमाने पर अपने कज़िन्स और
सगे चाचा आदि से शादी करने का चलन है …. और आप
जानते ही नहीं …..
ब्रह्मा ने अपनी ही पुत्री से विवाह किया सरस्वती से और बहुत है
मध्य प्रदेश में एक गोंड जाती में दादी से पोते की शादी करवाते है हिन्दू
यम-यमी संवाद
[जब बहन (यमी), अपने भाई (यम) के सामने रखती है ‘संभोग-प्रपोज’]
ऋग्वेद के ‘दशम-मण्डल’ में ‘यम’ और ‘यमी’, जिनमे ‘भाई-बहन’ के साथ ‘पति-पत्नी’ का रिश्ता हैं | ‘यमी’ अपने पति-भाई ‘यम’ के समक्ष कामेच्छा पूर्ति का आग्रह करती है, मगर उसका भाई नंपूसक होने के कारण अपनी बहिन-पत्नी का गर्भधारण करवाने में असमर्थ हैं। मगर कामातुर ‘पत्नी-बहिन’ ताने देते हुए, अपने ‘पति-भाई’ को संबंध बनाने के लिए जोर देती है। मगर प्राचीन “ब्राह्मणी-आर्य” परंपरा के अनुसार एक नामर्द-भाई, यदि संभोग के बावजूद भी अपनी ‘भोगिनी-पत्नी*” का गर्भ धारण करवाने में असफल रहता है, तब देवता-अश्विनीकुमारों का श्राप लग सकता है, जिसका ज्ञान उसके भाई (यम) को हो जाता है।
अतः पति-भाई (यम) अपनी बहिन-पत्नी (यमी) को “नियोग प्रथा” के अनुसार किसी अन्य पुरुष से ‘गर्भधारण’ करवाने की आज्ञा देता है ।
▬ प्रस्तुत है ‘यम-यमी’ (भाई-बहिन) के बीच संवाद : –
यमी:- “हे यम ! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है, कौन देख रहा है ?
फिर कौन पुरुष इस बात को दूसरे से कह सकेगा ? यह दिन मित्र देवता का स्थान है, यह दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरे अभिमत के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम, मुझे अनेक कर

मुझे अनेक कर्मों वाले मनुष्यों से सम्बन्ध हेतु किस प्रकार कहते हो ?
-मेरी इच्छा है कि पति को शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान होकर मैं अपने पति (यम) को अपनी देह उसी प्रकार अर्पित करूँ जैसे पहिये गतिशील मार्ग में संलिष्ट होते है, उसी प्रकार मैं होऊं |”
यम : (अपनी बहन से ) :“हे यमी ! देवदूत बराबर विचरण करते रहते हैं, वे सदा सतर्क रहते है, इसलिए- ‘हे काम की ईच्छा वाली (पत्नी), अब तू मुझे छोड़ कर अन्य किसी की पत्नी बन और शीघ्रता से जा कर उसके साथ रथ-चक्र के सामान संलिप्त हो |
संभवत: आगे चलकर ऐसे ही दिवस-रात्रि आयें जब बहन अपने बंधुत्व को पाने लगेंगी; अतः अभी ऐसा नहीं होता |
हे यमी ! तू सेवन-समर्थ अन्य पुरुष के लिए अपना हाथ बढ़ा और मुझे छोड़ कर अभी उसे ही अपना पति बनने की कामना कर |”
यमी : (अपने भाई (यम) का यह उत्तर सुन कर भी चुप नहीं होती, बल्कि वह एक बार फिर अपने भाई को ताना देते हुए कहती है) :-
“वह बन्धु कैसा, जिसके विद्यमान रहते ‘भगिनी’ इच्छित कामना से विमुक्त रह जाए, वह कैसी ‘भगिनी’ जिसके समक्ष ‘बंधु’ संतप्त हो ?
इसलिए तुम मेरी इच्छानुसार आचरण करो |”
यम : (फिर इनकार करते हुए कहता है) :“हे यमी ! मैं तेरी कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता | अब तू मुझे छोड़ कर अन्य पुरुष से इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर. मैं तेरे भार्यात्व की कामना नहीं करता |
ल हे यमी ! जब एक काम में अशक्त (गर्भाधान करवाने में असमर्थ पुरुष) भाई अपनी भगिनी का गर्भ धारण नहीं करवा करतां|
अतः मैं अकाम्य-पुरुष (Gay) ऐसा करूँ तो यह कर्म मेरे ह्रदय, मन और प्राण का भी नाश कर देगा |”
यह सुन कर तो मानों ‘यमी’ बिलकुल निराश ही हो गई दिखती है, वह कहती है :- “हे यम ! तेरी दुर्बलता पर मुझे दु:ख है. शायद तेरा मन मुझ में नहीं है, मैं तेरे ह्रदय को नहीं समझ सकी. वह किसी अन्य स्त्री से सम्बंधित होगा |”
अंत में यम यह कह कर अपनी बहन से पीछा छुड़ाता है :-
“हे यमी ! रस्सी जैसे अश्व में युक्त होती है, वृत्ति जैसे वृक्ष को जकड़ती है, वैसे ही तू अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले होवो और फिर तू अत्यंत कल्याण वाले सुख को प्राप्त हो.
-इन संवादों के आधार पर कहा जा सकता है की विदेशी-ब्राहमणार्यों में भारतागमन से पूर्व काम-संबंधों में किसी प्रकार की बंदिशें नहीं थी,अपितु पिता-पुत्री, भाई-बहिन, दादा-पोत्री, बहु-ससुर आदि में काम-सम्बन्ध निर्बाध रूप से होते थे | इन लोगों ने विवाह के संस्कार भारतागमन के बाद यहाँ से सीखे थे |

सगे भाई बहन बन सकते है ‘पति-पत्नी’ : हिन्दू धर्म का कड़वा सच वेंदो में लिखा ह
वेदों को भुदेवताओ द्वारा ज्ञान और विज्ञान का भंडार कह कर सारी दुनियाँ में प्रचारित किया जा रहा है| इसकी सच्चाई को जानने विदेशी भी संस्कृत का अध्यायन कर रहे है | नतीजा उन्हें भी पता चल जाएगा की वेदों कितने पानी में है | कुछ उदहारण निचे देखिये …….???
**वेदों में याम और यमी आपस में भाई बहन है इन दोनों की अश्लीलता देखिये ……….. ” क्या एक भाई बहन का पति नही बन सकता ….. मै वासना से अधीन होकर यह प्रार्थना करती हू कि तुम मेरे साथ एक हो जाओ और रमण करो ….. वाह रे ज्ञान के भंडार …….!!!!! वेदों के हिमायतियों को भाई बहन का त्यौहार **रक्षा बंधन ** से दूर ही रहना ठीक होगा |
***इसके साथ ही वेदों की कुछ ऋचाओं , में देवता उपस्थित है , कुछ में नही | कुछ में पुजारी उपस्थित है कुछ में नही | किसी ऋचा में देवता की स्तुति की गई है , तों किसी ऋचाओं में केवल याचना | कुछ में प्रतिज्ञाए की गई है , तों कुछ ऋचाओं में श्राप दिए गए है | कुछ ऋचाओं में दोषारोपण किया गया है और कुछ में विलाप किया गया है | कुछ ऋचाओं में इन्द्र से शराब और मांसाहार के लिए प्रार्थना की गई है |
वेदों में यह विभिन्नताए यह प्रमाणित कराती है की ये ऋचाए भिन्न -भिन्न ऋषियों ( 99% ब्राहमणों ) की रचना है | और हर ऋषि का अपना एक देवता है जिससे वह ऋषि अपनी इच्छा पूर्ति की प्रर्थना करता है | वेदों में न कोई आध्यात्म है, न कोई ज्ञान विज्ञान ,और न कोई नैतिकता |बल्कि अश्लीलता और पाखण्ड ,शराब पीने और मांसाहार करने का भरपूर बोलबाला | कोई महामूर्ख ही वेदों को ज्ञान -विज्ञान का भंडार कह सकते है |
अपनी बेटी से बलात्कार करने वाला, जगत रचयिता : ब्रह्मा
‘ब्रह्मा’शब्द के विविध अर्थ देते हुए श्री आप्र्टे के संस्कृत-अंग्रेजी कोष में यह लिखा है- पुराणानुसार ब्रह्मा की उत्पति विष्णु की नाभि से निकले कमल से हुई बताई गई है उन्होंने अपनी ही पुत्री सरस्वती के साथ अनुचित सम्भोग कर इस जगत की रचना की पहले ब्रह्मा के पांच सर थे,किन्तु शिव ने उनमें से एक को अपनी अनामिका से काट डाला व अपनी तीसरी आँख से निकली हुई ज्वाला से जला दिया. श्रीमद भगवत, तृतीय स्कंध, अध्याय १२ में लिखा है—
वाचं……………..प्रत्याबोध्नायं ||२९|| अर्थात : मैत्रेय कहते है की हे क्षता(विदुर)!हम लोगों ने सुना है की ब्रह्मा ने अपनी कामरहित मनोहर कन्या सरस्वती की कामना कामोन्मत होकर की ||२८|| पिता की अधर्म बुद्धि को देखकर मरिच्यादी मुनियों ने उन्हें नियमपूर्वक समझाया ||२९||क्या यह पतन की सीमा नहीं है.? इससे भी ज्यादा लज्जाजनक क्या कुछ और हो सकता है.?

Comments

Popular posts from this blog

तीसरा विश्वयुद्ध और भारत

वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरण

HUZOOR SALLALLAHUALAIHIWASALLAM KI ZAHIR ZINDIGAI ME OR WAFAAT KE BAAD WASILA KA SABOOT