फॉल ऑफ अमेरिका

विश्व की तीन महा शक्तियों फ्रांस अमेरिका तथा ब्रिटेन के बीच ठनी । फ्रांस ने अपने दूत आस्ट्रेलिया तथा अमेरिका से वापस बुलाए ।
2001 में 9/11 के बाद जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर अटैक करने का फ़ैसला किया था उस समय टाइम मैगज़ीन ने अपने कवर पर लिखा था 'एंड आफ तालिबान' मुझे लगता है कि आज दोबारा से टाइम मैगज़ीन को कुछ ऐसा ही लिखना चाहिए अमेरिका के लिए कि 'द एंड आप अमेरिका' । 

अफ़ग़ानिस्तान को सुपर पावर का कब्रिस्तान यूं ही नहीं कहा जाता है, फॉल आफ ग्रेट ब्रिटेन अफ़ग़ानिस्तान से ही हुआ, फॉल आफ यूएसएसआर अफ़ग़ानिस्तान से ही हुआ । और जिन्हें यूएसएसआर का टूटना और ग्रेट ब्रिटेन एंपायर का ख़त्म होना कहानी जैसा या इत्तेफ़ाक जैसा लगता है उनके लिए ताज़ा मिसाल है फॉल ऑफ अमेरिका । जी हां फॉल ऑफ अमेरिका या एंड ऑफ अमेरिका की शुरुआत भी हो चुकी है अफ़ग़ानिस्तान से । अफ़ग़ानिस्तान भागते हुए अमेरिका ने अपनी जो दुर्गति बनाई और दुनिया को दिखाई उससे उबरने के लिए उसे सदिया लगेंगी क्योंकि अमेरिका अफ़गानिस्तान से भागा नहीं है बल्कि 85 billion-dollar का हथियार भी छोड़कर भागा है । आज से लेकर के पूरी दुनिया के इतिहास में पसपा होने की ऐसी कोई भी घटना दूर दूर तक नज़र नहीं आती । आमने सामने की युद्ध में सेनाएं ख़त्म हो गई हैं, सेनापति मारे गए हैं, राजा मारे गए हैं, मौका देख कर के सेनाएं पीछे भी हैं मगर जिस तरह अमेरिका पीछे हटा है अफ़ग़ानिस्तान से अतीत में ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिलता । न सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान से भागा है बल्कि जिनसे लड़ रहा था आज उन्हीं से नेगोशिएशन और डील भी कर रहा है अगर इसे थूक कर चाटना कहा जाए तो भी ग़लत नहीं होगा ।

मगर फॉल ऑफ अमेरिका के लिए सिर्फ इतनी दलीलें काफी नहीं इसके लिए हमें सारी घटनाओं को सिलसिलेवार तरीके से देखना होगा । जहां एक तरफ अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से भागा है वहीं दूसरी तरफ वहां गल्फ से भी अपना बोरिया बिस्तर समेट रहा है । दिसंबर तक उसकी सेनाएं इराक से भी निकल जाएंगी, संभावना है कि सीरिया से भी उसके बाद निकलेंगी । गल्फ में इसका सबसे बड़ा सहयोगी सऊदी अरब था जिसकी सुरक्षा में उसने अपना अति आधुनिक पेट्रियाट एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम तैनात कर रखा था उसने वह सिस्टम तक निकाल लिया । यह उसी तरह है कि जैसे मैं कुछ दिनों के लिए आपके घर मेहमान बन कर रहने के लिए आऊं और आपके घर में कपड़े या सामान लटकाने के लिए कुछ खूंटिया गाड़ दूं और जब किसी बात पर नाराज़ हो करके आपके घर से जाने लगूं तो उन कीलों खूटियों को भी निकाल ले जाऊं ।

मगर रुकिए बात अभी ख़त्म नहीं हुई है, जो सबसे बड़ी बात है उसे आख़िर में कहूंगा मगर अभी कुछ और सबूत हैं दलीलें और घटनाएं हैं जिनका जिक्र करना ज़रूरी है । नाटो संगठन के बारे में आप जानते हैं उसका नेतृत्व अमेरिका करता है, हालांकि यह संगठन बना था यूएसएसआर को कमज़ोर करने के लिए उसके बढ़ते कदम को रोकने के लिए और नॉर्थ अटलांटिक देशों को सुरक्षा देने के लिए, उन देशों की सुरक्षा की पता नहीं मगर इसका फ़ायदा अमेरिका ने भरपूर उठाया । इसी संगठन का मुख्य साझीदार है तुर्की जो कि 5 साल पहले से ही नाटो का मेंबर रहते हुए भी नाटो के मुख्य प्रतिद्वंदी रूस के साथ गलबहियां कर रहा है आए दिन अमेरिका को आंखें दिखाता रहता है हर वह कार्य करता है जिससे अमेरिका को मिर्ची लगे । उसने अमेरिका के मना करने के बावजूद न सिर्फ़ रूस से एस 400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीद बल्कि S-400 मिसाइल सिस्टम से अमेरिका के f-16 फाइटर जेट को इंटरसेप्ट करने का एक्सपेरिमेंट भी कर डाला ।

यह तो रही तुर्की की बात । अगर एशिया की बात करें इंडियन सबकॉन्टिनेंट की बात करें तो अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी या पिट्ठू पाकिस्तान हुआ करता था ।पर आज अमेरिका को यह शिद्दत से एहसास हो रहा है अफ़ग़ानिस्तान में उसे सबसे बड़ी हार पाकिस्तान और आईएसआई ने दी है । इतना ही नहीं पाकिस्तान पूरी तरह से अमेरिका के मुख्य प्रतिद्वंदी रूस और चीन के खेमे में चला गया है । 2 दिन पहले सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा हम चीन की कीमत पर अमेरिका के साथ रिश्ते नहीं रख सकते, अमेरिका को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी ।

यह तो वह बातें हैं जो आर पार की हैं और साफ-साफ ज़ाहिर हैं मगर अमेरिका ने जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान से ख़ुद को पुल आउट किया उसके बाद यूरोपीय यूनियन भी अब अमेरिका पर भरोसा नहीं करना चाहता । यूरोपीय यूनियन ने प्रोपोजल दिया है कि क्यूं न हम सब मिलकर नाटो के तर्ज पर यूरोपीय फोर्स का गठन करें । यह प्रपोजल कितना आगे बढ़ता है यह अभी भविष्य के गर्भ में है मगर अमेरिका के नेतृत्व और नाटो के औचित्य पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाने के लिए काफी है । ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से निकलने लगा तो उसने नाटो सहयोगियों को विश्वास में नहीं लिया उन्हें अपनी स्ट्रैटजी में शामिल नहीं किया, उसने तालिबान के साथ बंद दरवाज़ों के पीछे क्या डील की उसके बारे में किसी को कुछ नहीं बताया । हालात यहां तक पहुंचे दर्जन भर से ज़्यादा ब्रिटिश सैनिकों को बुर्का पहनकर अफ़ग़ानिस्तान से भागना पड़ा, यही हाल उन सभी देशों का हुआ जो अमेरिका के भरोसे अफ़ग़ानिस्तान में आए थे । इस घटना के बाद कई नाटो देश तालिबान के साथ अपने लेवल पर डील करने लगे इसी सिलसिले में जर्मन प्रशासन ने अपने दम पर बिना किसी को विश्वास मिली है अफ़गानिस्तान में अपनी एंबेसी दोबारा चालू कर दी ।

अभी रुकिए क्योंकि फॉल ऑफ अमेरिका लिए जो सबसे बड़ी घटना हुई है उसका जिक्र मैं अब करने जा रहा हूं । हुआ यूं कि चाइना को काउंटर करने के लिए अमेरिका और यूके ने एक बार फिर से अपनी मतलब परस्ती का परिचय देते हुए बिना अपने अन्य सहयोगियों को विश्वास में लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ एक नया ब्लॉक बना डाला । हालांकि इस रीजन में कोई भी ब्लॉक बने उसमें इंडिया की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है मगर अमेरिका और यूके ने न सिर्फ़ इससे भारत को बाहर रखा बल्कि उससे चर्चा करना तक मुनासिब नहीं समझा । चलिए भारत को छोड़ देते हैं मगर अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी जो 1778 से जब अमेरिका ग्रेट ब्रिटेन की कॉलोनी हुआ करता था तब से उसका सहयोगी है फ्रांस । फ्रांस के ही सहयोग और समर्थन के नाते अमेरिका ब्रिटेन के उपनिवेशवाद से आजूाद हुआ और एक महान लोकतंत्र बनकर उभरा, इस ब्लॉक को बनाने में अमेरिका ने फ्रांस को भी विश्वास में नहीं लिया । ज्ञात रहे थे अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगियों में फ्रांस, जर्मनी ऑस्ट्रेलिया, यूके प्रमुख मगर इस बार यूके,यूएस और आस्ट्रेलिया ने ऐसी चाल चली फ्रांस चारों खाने चित हो गया । इसका इंपैक्ट यह हुआ फ्रांस इतना झुंझला गया कि उसने आस्ट्रेलिया से और अमेरिका से अपने अंबेसडर तक वापस बुला लिए । अंबेसेडर को वापस बुला लेने का अर्थ है कि संबंधों को पूरी तरह ख़त्म कर देना । हालांकि संभावना है कि नेगोशिएशन के बाद संबंध फिर से बहाल हो जाएं मगर यह भी तय है कि अब इन संबंधों में न तो वह विश्वास रहा है न ही वह गर्मजोशी बचेगी जो इसकी पहचान हुआ करती थी ।

दरअसल हुआ यूं कि दुनिया के आखिरी छोर पर बसा ऑस्ट्रेलिया मात्र तीन करोड़ की आबादी वाला एक छोटा सा देश जिसके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह दुनिया की विश्व शक्तियों के साथ प्रतिद्वंदिता कर सकें मगर इसके बावजूद उसकी दुश्मनी इसी रीज़न में चाइना के साथ है । ऑस्ट्रेलिया की दुश्मनी चाइना के साथ किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं बल्कि अमेरिका के कारण ही है और इस रीजन में चीन को काउंटर करने के लिए अमेरिका तथा यूके ने मिलकर यह डिसाइड किया कि हम इस रीज़न में ऑस्ट्रेलिया को फैसिलिटेट करेंगे उसे स्ट्रांग करेंगे ताकि वह चीन को टक्कर दे सके । ऑस्ट्रेलिया भी अपने आप को सुरक्षित रखने अथवा वर्चस्व की लड़ाई में अपना सम्मान बनाए रखने तथा बचाए रखने के लिए फ्रांस के साथ परमाणु पनडुब्बियों के लिए बातचीत की थी । फ्रांस को पूरा विश्वास था कि 90 अरब डॉलर का यह सौदा हो जाएगा वह पूरी तरह आश्वस्त था मगर अचानक ही इस सौदे को अमेरिका और यूके ने झपट लिया । और यहां पर अमेरिका तथा यूके ने तो फ्रांस को अंधेरे में रखा ही ऑस्ट्रेलिया ने भी फ्रांस को पूरी तरह अंधेरे में रखा और जब ख़बर वायरल हुई तब फ्रांस ने ख़ुद को ठगा सा महसूस किया उसे कुछ यूं महसूस हुआ कि जैसे किसी ने उसकी पीठ में छुरा घोंप दिया है ।

कहने का मतलब यह है कि फॉल ऑफ अमेरिका में इस घटना का भी बड़ा रोल होगा ऐसा मेरा अनुमान है क्योंकि फ्रांस नामक ही जो ईंट हिली है यह भले ही अपनी जगह पर दोबारा लग जाए मगर इसने पूरी इमारत को हिला दिया है और यह बता दिया है अब यहां अमेरिकन सुपर पावर नामक इमारत कभी भी ट्विंस टावर की तरह भरभरा कर बैठ जाएगी

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