क्या खुदा शरीर धारी है ?

कुछ हिन्दू और आर्य समाजी भाई जो इस्लाम धर्म के प्रति कुंठा रखते है,
वो इस्लाम धर्म के प्रति सदैव दुष्प्रचार करते रहते है। और वो अक्सर आम
मुसलमानों में इस्लाम के प्रति शंकाएँ उत्पन्न करने के लिए उनसे तरह तरह
के प्रश्न करते रहते हैं। बहुत से मुसलमान अज्ञानता के कारण उनसे
प्रभावित हो जाते हें। उनके इन प्रश्नों में से कुछ प्रश्न अल्लाह के
व्यक्तित्व के बारे में होते हैं, जिसमे वे पवित्र कुरआन की कुछ आयात के
अर्थों का अनर्थ करते हैं और साधारण मुसलमानों को परेशान करते हैं।
वे मुसलमानों से पूछते हैं कि क्या कुरआन में बताया गया है कि अल्लाह के
हाथ हैं ?, अल्लाह किसी सिंहासन (अर्ष या कुर्सी) पर बैठे हैं ? उस
सिंहासन को आठ फरिश्ते उठाए हुए हैं? क्या अल्लाह शरीर धारी और
साकार है ? इन प्रश्नों के बाद वे आर्य प्रचारक वेदों से ईश्वर
को निराकार सिद्ध करने लगते हैं और वेद के ईश्वर की बड़ाई करने लगते हैं।
साधारण मुसलमान उनके प्रश्नों से शंकाओं में घिर जाता है।

इस लेख में मैं
यह कोशिश करूंगा कि इन प्रश्नों का सही उत्तर आपको मिल जाए।
जबकि ईश्वरीय ग्रंथो में ईश्वर के गुणो के लिए अलंकारिक कलात्मक
भाषा का प्रयोग किया गया है।
इन सब बातों को समझने के लिए एक सिद्धान्त ज़रूर याद रखना चाहिए।
कि अल्लाह के गुणों के बारे में जिन शब्दों का प्रयोग हम अपने जीवन में
करते हैं, वे शब्द उन गुणों की वास्तविकता को व्यक्त करने वाले नहीं होते
हैं, क्योंकि जिन शब्दों का हम अल्लाह के गुणों को बताने के लिए प्रयोग
करते हैं, उनही का प्रयोग हम अपने गुणों को बताने के लिए करते
हैं,यद्यपि अल्लाह के गुण हमारे तरह के नहीं है।

उदाहरण के लिए जब हम अपने बारे में ‘देखना‘ शब्द का प्रयोग करते हैं,
तो हमारे दिमाग में यह अवधारणा होती है कि हमारी आँखे होती हैं, जिस
में दृष्टि की क्षमता है, फिर बाहर से रोशनी की किरणें वस्तुओं से टकराकर
हमारी आँखों में उनकी तस्वीरें बनाती हैं जो दृष्टि तंत्रिका (optic nerve)
के माध्यम से हमारे दिमाग तक पहुँचती हैं। लेकिन यही शब्द ‘देखना‘ जब
हम अल्लाह के लिए बोलते हैं, तो हमारा तात्पर्य यह
नहीं होता कि अल्लाह को भी देखने के लिए
आँखों की या रोशनी की या दृष्टि तंत्रिका की आवश्यकता है।
इसी प्रकार ‘सुनना‘ शब्द का हम अल्लाह के लिए प्रयोग करते हैं कि वह
हमारी स्तुतियों और प्रार्थनाओं को सुनता है। लेकिन जब एक
आर्यसमजी या हिन्दू भी कहता है कि “ईश्वर सब कुछ देखता है और सब
कुछ सुनता है’ तो कोई मूर्ख पंडित उस से नहीं पूछता कि क्या ईश्वर
की आँखें और कान हैं ? मैं भी आर्यों से पूछता हूँ कि जब ऋग्वेद परमेश्वर
को विश्वचक्षाः अर्थात ‘समस्त जगत का दृष्टा परमेश्वर‘ कहता है
(देखोमण्डल 10, सूक्त 81, मंत्र 2) तो क्या तुम्हारे ईश्वर की वास्तव में
आँखें (चक्षु) हैं ?

इसी के बाद का मंत्र इस प्रकार है :--
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् |
अर्थात – सब तरफ आखों वाला, सब तरफ मुख वाला, सब तरफ बाहु
वाला, सब तरफ पैर वाला (परमेश्वर है) [ऋग्वेद 10/81/3]
अब अगर कोई इनसे पूछे कि क्या तुम्हारे परमेश्वर की आँखें, मुख, बाज़ू
और पैर हैं, तो क्या उत्तर देंगे?
अल्लाह के बारे में पवित्र कुरआन में आया है :----

ﻟَﻴْﺲَ ﻛَﻤِﺜْﻠِﻪِ ﺷَﻲْﺀٌ ۖ ﻭَﻫُﻮَ ﺍﻟﺴَّﻤِﻴﻊُ ﺍﻟْﺒَﺼِﻴﺮُ

अर्थात – उसके सदृश कोई चीज़ नहीं। वही सबकुछ सुनता, देखता है[सूरह
शूरा 42; आयत 11]

आर्यों को इसी वास्तविकता के न समझने के कारण ठोकर लगी है। वे
कहते हैं कि जिस प्रकार हम दुनिया में कोई वस्तु बिना साधन के
नहीं बना सकते वैसे ही उनका ईश्वर भी बिना साधनों के कुछ
नहीं बना सकता। यद्यपि दूसरी और यह भी मानते हैं कि उनका ईश्वर
देखता है लेकिन हमारी तरह नहीं। सुनता है, लेकिन हमारी तरह नहीं। इन
गुणों में हमारी तरह किसी साधन पर निर्भर नहीं है, फिर समझ में
नहीं आता कि कोई वस्तु बनाने में साधनों पर निर्भर क्यों है ?
पवित्र कुरआन में आया है,

ﻭَﻗَﺎﻟَﺖِ ﺍﻟْﻴَﻬُﻮﺩُ ﻳَﺪُ ﺍﻟﻠَّﻪِ ﻣَﻐْﻠُﻮﻟَﺔٌۚﻏُﻞْﺕَّ ﺃَﻳْﺪِﻳﻬِﻢْ ﻭَﻟُﻌِﻨُﻮﺍ ﺑِﻤَﺎ ﻗَﺎﻟُﻮﺍۘﺑَﻞْ ﻳَﺪَﺍﻩُ
ﻣَﺒْﺴُﻮﻃَﺘَﺎﻥِ ﻳُﻨْﻔِﻖُ ﻛَﻴْﻒَ ﻳَﺸَﺎﺀُ

अर्थात – और यहूदी कहते है, “अल्लाह का हाथ बँध गया है।” उन्हीं के
हाथ-बँधे है, और फिटकार है उनपर, उस बकवास के कारण जो वे करते है,
बल्कि उसके दोनो हाथ तो खुले हुए है। वह जिस तरह चाहता है, ख़र्च
करता है।[सूरह माइदह 5; आयत 64]
अब यहाँ शब्द ‘यद‘ ﻳَﺪَ से कोई शारीरिक हाथ तात्पर्य नहीं है। बल्कि यह
एक अलंकारिक कलात्मक विवरण है। यहूदियों ने गरीब
मुसलमानों को ताना देकर अल्लाह पर एक अपमानजनक आक्षेप
किया कि अल्लाह का हाथ बंधा है अर्थात अल्लाह कंजूस है।
मुसलमानों को भौतिक सुख नहीं देता। इस पर उत्तर मिला कि अल्लाह के
दोनों हाथ खुले हैं अर्थात अल्लाह तोउदार है। अल्लाह इन गरीब
मुसलमानों को आध्यात्मिक और भौतिक सुख, दोनों देगा और तुम देखते रह
जाओगे।
अब ज़रा हम ऋग्वेद के एक प्रसिद्ध सूक्त, मण्डल 10, सूक्त 90, को देखलें
जिसको पुरुष सूक्त कहा जाता है। इस सूक्त में आर्यों के ईश्वर को एक
पुरुष की तरह बताया गया है और इस शरीरधारी ईश्वर के अंगों से अलग
अलग वस्तुओं का पैदा होना बताया गया है। इसी सूक्त के मंत्र 12 और
13 को देखिए,

बराह्मणो.अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कर्तः |
ऊरूतदस्य यद वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ||
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत |
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च पराणाद वायुरजायत ||

उस परमेश्वर के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, उसके बाहु से क्षत्रिय, उरू से
वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। उसके मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, उसके
चक्षु (आँखों) से सूर्य, मुख से इंद्रा और अग्नि तथा प्राण से वायु उत्पन्न
हुए।[ऋग्वेद 10/90/12-13]

वेदो कि इस अलंकारिक भाषा को जो पंडित नही समझ पाये उन्होंने इन
मंत्रो के आधार पर ही ईश्वर को रूप दे दिया और मूर्ती पूजा शुरू कर दी।
उन पंडितो ने सोचा कि ईश्वर ने पूरी सृष्टि को बनाया तो उसके हाथ होंगे,
ईश्वर सब कुछ सुन सकता है, देखता है, तो उसके भी कान, आँख होंगे।
कुछ पंडितो ने सोचा होगा कि ईश्वर पूरी सृष्टि को अकेले कैसे
बना सकता है, इसीलिए उन्होंने ईश्वर के सहायक भगवान और
देवी देवताओ का रूप गढ़ दिया, हर वास्तु का अलग अलग
देवी देवता बना दिया जैसे- जन्म देने वाला भगवान् अलग, पालन करने
वाला अलग, म्रत्यु देने वाला भगवान् अलग, कुछ पंडितो ने सोचा किस
ईश्वर पूरी सृष्टि को दो हाथो से कैसे बना सकता है, इसीलिए उन्होंने किसी भगवान के चार हाथ, किसी के आठ हाथ तो किसी के हजार हाथ बना दिए।

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