मनुस्मृति की हक़ीक़त

FBP/17-91

मनुस्मृति :-

ब्राह्मणवादी दरअसल दोगले होते हैं , बल्कि महादोगले कहिए।

जब यह कमज़ोर होते हैं तो याचक की भूमिका में रहते हैं। भिक्षा माँगते हैं , इस स्थिति में इनसे मनुस्मृति की बात कीजिए तो यह इससे इन्कार करेंगे और मनुस्मृति को अप्रसांगिक मानेंगे।

परन्तु जैसे ही यह मज़बूत होते हैं या सत्ता इनके हाथ में मिलती है इनकी "मनुस्मृति" के हाथों गिरवी आत्मा सामने प्रकट हो कर प्रोफेसर मनु की तरह आचरण करने लगती है। दरअसल इसी कारण यह महादोगले होते हैं।

मनुस्मृति का पूरा सिद्धांत ही ब्राह्मणवादियों के ताकतवर होने की स्थिति बयान करता है , यह चरित्र केवल बल प्रयोग करके ही दिखाया जा सकता है । इसके लिए सत्ता आवश्यक है , ब्राह्मणवादी इसलिए येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाना चाहता है।

भारत के इस काल में ब्राह्मणवादी मजबूत हैं तो तमाम राज्यों में इनके हाथों में सत्ता है। और मनुस्मृति का सिद्धान्त लगभग लागू है , दलित , मुसलमान और महिलाएँ इनके आक्रमण के केन्द्र में हैं।

मुसलमान , प्रोफेसर मनु की स्मृति में कहीं नहीं क्युँकि प्रोफेसर मनु के समय इस्लाम था ही नहीं , तो आज की परिस्थितियों में मनुवाद के फैलने में सबसे बड़े बैरियर इस्लाम इनके आक्रमण के केन्द्र में है।

इस्लाम मनुस्मृति के बिलकुल विपरीत संदेश देता है , सभी इंसान महिला और पुरुषों को बराबर का अधिकार देता है इसीलिए आज मनुवादियों के आक्रमण में सबसे अधिक मुसलमान और इस्लाम है।

नीचे लिखीं पंक्तियों को आज की परिस्थितियों में रख कर 2 मिनट सोचिएगा।

बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने किस लिए "मनुस्मृति" जलायी थी ? उन्होने वेद और उपनिषद तो नहीं जलाये थे तो मनुस्मृति को क्युँ जलाया ?

क्योंकि मनुस्मृति , मज़दूरों ,सर्वहारा वर्ग, महिलाओं, बच्चों, प्रकृति से जुड़े कृषिकार्य वाले समुदायों को हजारों जातियों में बांट करके जाति वर्ग की सत्ता बहाल करती है जिसके विरोध स्वरूप बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने मनुस्मृति जला दिया था ।

क्या है मनुस्मृति ?

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम। दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्।।     
          
                          (मनुस्मृति  1/13)

"जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तू अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजु, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।" वेदों के बाद मनुस्मृति को हिन्दुओं का प्रमुख ग्रंथ माना गया है। मनुस्मृति में वेदसम्मत वाणी का खुलासा किया गया है।

वेद को कोई अच्छे से समझता या समझाता है तो वह है मनुस्मृति। यह मनुस्मृति पुस्तक महाभारत और रामायण से भी प्राचीन है , महाभारत और रामायण में ऐसे कुछ श्लोक हैं, जो मनुस्मृति से ज्यों के त्यों लिए गए हैं। इससे सिद्ध होता है कि "महर्षि मनु" श्रीकृष्ण और राम से पहले हुए थे और उनकी मनुस्मृति उन्हीं के काल में लिखी गई थी।

तब कितनी पुरानी है मनुस्मृति ? मनु वादियों के जो तथ्य दिये जाते हैं उसके अनुसार लगभग 10000 वर्ष पूर्व "मनु" द्वारा 12 भागों की यह पुस्तक लिखी गई जो पूरी तरह ब्राम्हणवाद के व्यवस्था को पैदा करती थी ।

खुद देखिए कुछ उदाहरण ।

☆विवाह :-

मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं जिन्हें विभिन्न स्वभाव वाले लोगों के लिए अनिवार्य बताया गया है।

ये 8 प्रकार के विवाह है: ब्रहम, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गंधर्व, राक्षस , पिचास ।

इनमें ब्रहम विवाह को सर्वोत्तम माना जाता है जबकि राक्षस और पिचास विवाह को निम्नतम माना जाता है। मनुस्मृति में ही लिखा है कि ब्राहमण के लिए विवाह के शुरू के छह प्रकार यथा ब्रहम, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गंधर्व उपयुक्त माने गए हैं तो क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के लिए आर्ष, प्रजापत्य, असुर तथा गंधर्व विवाह उचित बताए गए हैं।

☆आतिथ्य व्यवस्था :-

● ब्राह्मण के घर केवल ब्राह्मण ही अतिथि माने जाएंगे। (और वर्ण की व्यक्ति नही)।

● क्षत्रिय के घर ब्राह्मण और क्षत्रिय ही ऐसे दो ही अतिथि माने जाएंगे।

● वैश्य के घर ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य तीनो द्विज अतिथि हो सकते हैं, लेकिन ...।

● शूद्र के घर केवल शूद्र ही अतिथि हो सकता है ।(अध्यायः३:श्लोक:११०) और कोई वर्ण व्यक्ति शुद्र के घर आ नही सकता...।

☆जाति व्यवस्था :-

● ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य को यदि शूद्र अपशब्द बोले तो दंड स्वरूप उसकी ज़बान काट देनी चाहिए।

● तुच्छ वर्ण का होने के कारण उसे यही दंड मिलना चाहिए ।

● यदि कोई शुद्र घमंड में आकर ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य के नामों को रखता है तो उसके मुँह पर लोहे की दस अंगुल जलती हुई कील ठोक देनी चाहिए।

● शुद्रों के धन को निर्भीक होकर ब्राम्हण ले सकता है क्योंकि शुद्र को धन रखने का अधिकार नहीं।

● शुद्र यदि समर्थ है तब भी उसे धन रखने का अधिकार नहीं क्युँकि फिर वह ब्राह्मणों के लिए कष्ट बन जाता है।

☆ वर्ण (जाति) आधारित दैनिक कार्यों का विभाजन :-

महातेजस्वी ब्रह्मा ने श्रृष्टि की रचना के लिए ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को भिन्न-भिन्न कर्म निर्धारित किया है ।

● पढ़ना,पढाना,यज्ञ करना-कराना,दान लेना यह सब ब्राह्मण को कर्म करना हैं।    
         
                               (अध्यायः१:श्लोक:८७)

● प्रजा रक्षण , दान देना, यज्ञ करना, पढ्ना...यह सब क्षत्रिय को करने के कर्म हैं।
          
                              (अध्यायः१:श्लोक:८९)

● पशु-पालन , दान देना,यज्ञ करना, पढ्ना,सुद(ब्याज) लेना यह वैश्य को करने का कर्म हैं। (अध्यायः१:श्लोक:९०)

● द्वेष-भावना रहित, आनन्दित होकर उपर्युक्त तीनो-वर्गो की नि:स्वार्थ सेवा करना, यह शूद्र का कर्म हैं।  (अध्यायः१:श्लोक:९१)

☆ महिलाओं के संबंध में :-

स्त्रियों के संबंध में मनुस्मृति के प्रावधान इतने घटिया हैं कि उसे विस्तार से यहाँ लिखना संभव ही नहीं ,ब्राम्हणों क्षत्रिय और वैश्यों द्वारा शुद्र महिलाओं से शारीरिक संबंधों को दंडनीय करने के बजाए मनुस्मृति सराहना करता है तो समान वर्ण की महिलाओं के साथ ऐसा करने पर महिलाओं के पिता को धन देकर शारीरिक संबंधों को वैधता प्रदान करता है , शुद्र यदि ऐसा अपने जाति के ऊपर की महिलाओं के साथ करता है तो उसे मृत्युदंड के अतिरिक्त और कोई दंड नहीं दिया जा सकता । यह देखिये .......।

१- पुत्री,पत्नी,माता या कन्या,युवा,व्रुद्धा किसी भी स्वरुप में नारी स्वतंत्र नही होनी चाहिए। (मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-२ से ६ तक)

२- पति पत्नी को छोड सकता हैं, सुद(गिरवी) पर रख सकता हैं, बेच सकता हैं, लेकिन स्त्री को इस प्रकार के अधिकार नही हैं. किसी भी स्थिति में, विवाह के बाद, पत्नी सदैव पत्नी ही रहती हैं।(मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-४५)

३- संपति और मिलकियत के अधिकार और दावो के लिए, शूद्र की स्त्रियाँ भी "दास" हैं, स्त्री को संपति रखने का अधिकार नही हैं, स्त्री की संपति का मलिक उसका पति,पूत्र, या पिता हैं।(मनुस्मुर्तिःअध्याय-९ श्लोक-४१६)

४- ढोर, गंवार, शूद्र और नारी, ये सब ताडन के अधिकारी हैं, यानी नारी को ढोर की तरह मार सकते हैं ।....तुलसी दास पर भी इसका प्रभाव दिखने को मिलता हैं, वह लिखते हैं-"ढोर,चमार और नारी, ताडन के अधिकारी."
                   ( मनुस्मुर्तिःअध्याय-८ श्लोक-२९९)

५- असत्य जिस तरह अपवित्र हैं, उसी भांति स्त्रियां भी अपवित्र हैं, यानी पढने का, पढाने का, वेद-मंत्र बोलने का या उपनयन का स्त्रियो को अधिकार नही हैं।
(मनुस्मुर्तिःअध्याय-२ श्लोक-६६ और अध्याय-९ श्लोक-१८)

६- स्त्रियां नर्कगामीनी होने के कारण वह यज्ञकार्य या दैनिक अग्निहोत्र भी नही कर सकती।(इसी लिए कहा जाता है-"नारी नर्क का द्वार") (मनुस्मुर्तिःअध्याय-११ श्लोक-३६ और ३७ )

७- यज्ञ कार्य करने वाली या वेद मंत्र बोलने वाली स्त्रियो से किसी ब्राह्मण को भोजन नही लेना चाहिए, स्त्रियो के किए हुए सभी यज्ञ कार्य अशुभ होने से देवो को स्वीकार्य नही हैं। (मनुस्मुर्तिःअध्याय-४ श्लोक-२०५ और २०६)

८- मनुस्मृति के मुताबिक , स्त्री पुरुष को मोहित करने वाली है।( अध्याय-२ श्लोक-२१४)

९ - स्त्री पुरुष को दास बनाकर पदभ्रष्ट करने वाली हैं। (अध्याय-२ श्लोक-२१४)

१० - स्त्री एकांत का दुरुप्योग करने वाली. (अध्याय-२ श्लोक-२१५.)

११. - स्त्री संभोग के लिए उमर या कुरुपता को नही देखती.( अध्याय-९ श्लोक-११४)

१२- स्त्री चंचल और हदयहीन,पति की ओर निष्ठारहित होती हैं.( अध्याय-२ श्लोक-११५)

१३.- केवल शैया, आभुषण और वस्त्रो को ही प्रेम करने वाली, वासनायुक्त, बेईमान, इर्ष्या  खोर ,दुराचारी हैं . (अध्याय-९ श्लोक-१७)

१४.- सुखी संसार के लिए स्त्रियों को कैसे रहना चाहिए ? इस प्रश्न के उतर में मनु कहते हैं-

●स्त्रीओ को जीवन भर पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. - (मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-११५)

●पति सदाचारहीन हो,अन्य स्त्रियों में आशक्त हो, दुर्गुणो से भरा हुआ हो, नंपुसंक हो, जैसा भी हो फ़िर भी स्त्री को पतिव्रता बनकर उसे देव की तरह पूजना चाहिए.-    
     (मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-१५४)

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में इसी कारण महिला प्रतिबंधित है।

☆बलात्कार पर मनुस्मृति :-

●ब्राह्मण अगर अवैधिक (गैरकानूनी) संभोग करे तो केवल सर का मुंडन कराएँ ।

●क्षत्रिय अगर अवैधिक (गैरकानूनी) संभोग करे तो १००० भी दंड करे।

●वैश्य अगर अवैधिक (गैरकानूनी) संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये और १ साल के लिए कैद और बाद में देश निष्कासित।

●शूद्र अगर अवैधिक (गैरकानूनी) संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये , उसका लिंग काट लिया जाये।

●शूद्र अगर दूसरी जाति के साथ अवैधिक (गैरकानूनी) संभोग करे तो उसका एक अंग काट कर उसकी हत्या कर दे.
(अध्यायः८:श्लोक:३७४,३७५,३७९)

ध्यान दीजिए कि ब्राह्मणवादियों के एक प्रदेश से कैसे महिलाओं को बेचने के कार्यक्रम लगातार चल रहा है , इसके लिए अब अनलाइन व्यवस्था भी मनुवादियों ने अपना ली है।

☆हत्या के अपराध में कोन सी कार्यवाही हो ?:-

●ब्राह्मण की हत्या यानी ब्रह्महत्या महापाप।(ब्रह्महत्या करने वालो को उसके पाप से कभी मुक्ति नही मिलती)

●क्षत्रिय की हत्या करने से ब्रह्महत्या का चौथे हिस्से का पाप लगता हैं।

●वैश्य की हत्या करने से ब्रह्महत्या का आठ्वे हिस्से का पाप लगता हैं।

●शूद्र की हत्या करने से ब्रह्महत्या का सोलह्वे हिस्से का पाप लगता हैं.(यानी शूद्र का जीवन बहुत सस्ता है) (अध्यायः११:श्लोक:१२६) ।

☆मनुस्मृति में गोमांस खाने की अनुमति :-

उष्‍ट्रवर्जिता एकतो दतो गोव्‍यजमृगा भक्ष्‍याः
               (मनुस्मृति 5/18)
मेधातिथि भाष्‍यऊँट को छोडकर एक ओर दांवालों में गाय, भेड, बकरी और मृग भक्ष्‍य अर्थात खाने योग्‍य है ।

संविधान के जनक बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने इसीलिए मनुस्मृति जलाकर इसका विरोध किया जिसे हिन्दू महासभा आजादी के बाद लागू करने के लिए प्रयासरत थी ।

दरअसल वैधानिक रूप से मनुस्मृति अब लगभग अप्रसांगिक है और डाक्टर अंबेडकर का बनाया भारत का संविधान ही सभी के लिए सर्वश्रेष्ठ है परन्तु ब्राह्मणवादियों के हृदय में आज भी मनुस्मृति जीवित है। राजस्थान के जोधपुर उच्च न्यायालय में मनु महाराज की लगी मुर्ति इसका जीवित उदाहरण है।

यह भी सच है कि देश मनुस्मृति नहीं चाहता है। परन्तु संघ की सोच और गुपचुप तरीके से उसका "मनुस्मृति" के लिए प्रयास का परिणाम ही है कि सरस्वती शिशु मंदिर के विद्यार्थी उच्चतम न्यायालय में जज बनकर अपने फैसलों में "मनुस्मृति" को उद्धत करते हैं  तो साजिशें दिखाई देती हैं और इसलिए "मनुस्मृति" क्या कहता है उसको सामने लाना आवश्यक है ।

आज की परिस्थितियों में 99% बलात्कार करने वाले हत्या करने वाले , एक धर्म के विरुद्ध ज़हर ऊगलने वाले , एक जाति के विरुद्ध उत्पीड़न करने वाले , महिलाओं पर अत्याचार करने वाले सब के सब मनुवाद के ध्वजवाहक हैं। अब ध्यान लगाकर इनके व्यवहार और चरित्र को समझिएगा , इन सबमें आपको प्रोफेसर मनु महाराज दिखाई देंगे।

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