दुनिया और उसकी बदलती चाल
कोरोना इस दौर की एक अबूझ पहेली बन चुका है..यहां तक कि बनी-आदम में इस बात को लेकर दो गिरोह वजूद में आ चुके हैं , एक गिरोह इसे नेचुरल या अज़ाब-ए-इलाही क़रार देता है तो दूसरा गिरोह इसे साज़िशी नज़रिये से देखता है..पहले गिरोह की तादाद बहुत ज़्यादा है तो दूसरे गिरोह यानि साज़िशी थ्योरी पर यक़ीन रखने वालों की तादाद दाल में नमक जैसी...और इत्तेफ़ाक़ से मैं भी इसी दूसरे गिरोह से त'अल्लुक़ रखता हूं..गोकि शुरूआत में मेरा रूझान भी पहले गिरोह की तरफ ही था लेकिन ह़ालात व वाक़्यात ने मेरे नज़रिये को तब्दील कर दिया..ख़ैर
जो लोग कोरोना को नेचुरल या अज़ाब-ए-इलाही मानकर चल रहे हैं उन्हें चाहिए कि वह कस़रत से अस्तग़फ़ार और इस मोज़ी मर्ज़ से बचाने वाली दुआओं का एह्तेमाम करें और ख़ास़तौर पर नमाज़ों की पाबंदी करें..
और जो लोग इसे साज़िश मानते हैं वह भी जान लें कि बह़रह़ाल साज़िश भी एक सख़्त आज़माइश होती है जिससे अल्लाह की मदद के बग़ैर निकलना नामुमकिन है..इसलिए अस्तग़फ़ार दुआ और नमाज़ के पाबंदी से यह गिरोह भी आज़ाद नहीं हो सकता...
बह़रह़ाल मैंने जो क़लम उठाया है इसी दूसरे गिरोह की तरफ़ से उठाया है..जो लोग इसे साज़िश , लैब मेड या प्रोग्राम ऑफ डेथ समझ रहे हैं जिसे जानबूझकर और मुनज़्ज़म तरीक़े से पूरी दुनिया पर मुसल्लत कर दिया गया और इत्तेफ़ाक़ से साथ में ही टिड्डी दल का लश्कर अरब के स़ह़राओं से निकल कर ईरान से होते हुए सबकॉन्टिनेंट के फ़स़लों पर ह़मले करता देख रहे हैं..वह सबसे पहले अरब के क्लाइमेट और मौसमियात के बारे में पढ़कर समझ लें कि इन इलाक़ों में पहले बारिशें नहीं होती थीं..लेकिन पिछले साल से बारिश इतनी ज़्यादा हो रही है कि ऐसा लगता है जैसे टिड्डी दल को ख़ोराक मिल गयी हो और उनमें जान पैदा हो गई हो..?
और यही ह़ाल हमारे देश में भी हुआ है कि पिछले एक साल में कोई भी ऐसा दस दिन मुझे याद नहीं जब बारिश न हुई हो..कुछ इलाक़े अपवाद हो सकते हैं लेकिन दोहरे मानसून की मार पूरे भारत ही नहीं उपमहाद्वीप में पड़ी है यह एक सच्चाई है...
दरअस़ल इंसान जब जब कमीनगी पर उतरा है तो ख़ुद को ख़ुदा के मुक़ाबले में खड़ा करने में तनिक भी हिचक नहीं दिखाई है...
तमाम अंबिया(अ०स०) की पेशगोई के मुत़ाबिक़ इंसानी तारीख़ का सबसे बड़ा फ़ित्ना शायद हमारे ही दौर में बरपा होना है(?)जिसमें टेक्नॉलिजी और अदृश्य हथियारों द्वारा धोखा और साज़िश का इस्तेमाल भी आख़िरी ह़द तक होना है या यूं कह लें कि शुरू हो चुका है..
फ़ित्ना-ए-दज्जाल का मुनकिर दरअस़ल स़ह़ी अह़ादीस़ का मुनकिर होगा..
यह बात क़ुरआन के एक ख़ुलास़े के साथ ख़त्म करना चाहूंगा..
""लोगों में से कोई ऐसा है जो कहता है कि हम ईमान लाये अल्लाह पर , मगर जब वह अल्लाह के मामले में सताया गया तो उसने लोगों की डाली हुई आज़माइश को अल्लाह के अज़ाब की तरह समझ लिया , अब अगर तेरे रब की तरफ़ से फ़तह़-ओ-नुस़रत आ गई तो यही शख़्स कहेगा कि 'हम तो तुम्हारे साथ थे' क्या दुनिया वालों के दिलों का ह़ाल अल्लाह को बख़ूबी मालूम नहीं है?""(अल-अनक़बूत-10)
आगे बढ़ने से पहले हमें जानना होगा कि आज़माइश और अज़ाब दो अलग-अलग चीज़ें हैं..अक्स़र-ओ-बेश्तर आज़माइश में अल्लाह के नेक बंदे डाले जाते हैं , जबकि अज़ाब के ह़क़दार बदतरीन लोग ठहराये जाते हैं..पिछली बात में सूरः अल-अनकबूत की जिस आयत का ज़िक्र किया है अगर हम उसको बिल्कुल संक्षेप में समझने की कोशिश करें तो ख़ुलास़ा यह निकलेगा कि..इंसानों के ज़रिए लोगों को दी गई चोट और तकलीफ़ भी होती है जिसे अक्सर जाने अनजाने में लोग अज़ाब-ए-इलाही समझ लेते हैं , अब अल-अनकबूत की अगली आयत देखिए..
"और अल्लाह को तो ज़रूर ये देखना है कि ईमान लाने वाले कौन हैं और मुनाफ़िक़ कौन(11)
अब अगर आप पहचान करने में चूक जायें और समझ ना सकें कि आज़माइश है या अज़ाब तो आपकी सारी तदबीर और तरतीब ग़लत सिम्त में सफ़र करना शुरू कर देगी और फिर शायद आप वही कर बैठें जो आपका दुश्मन आपसे उम्मीद किए बैठा है..दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो आपने नासमझी में दुश्मन की राह आसान कर दी..यहां पर एक और आयत की मिस़ाल देखिए..
""दुनिया की यह ज़िंदगी इसकी मिस़ाल ऐसी है जैसे आसमान से हमने पानी बरसाया तो ज़मीन की पैदावार , जिसे इंसान और जानवर सभी खाते हैं , ख़ूब घनी हो गई फिर ऐन उस वक़्त जबकि ज़मीन अपने जोबन पर थी और खेतियां ख़ूब ख़ूब बन संवर का तैयार खड़ी थीं और उनके मालिक यह समझ रहे थे अब हम उनसे फाएदा उठाने पर पूरी क़ुदरत पा चुके हैं (कि) अचानक रात को या दिन को हमारा ह़ुक्म आ गया और हमने उसे ऐसा तबाह-ओ-बर्बाद कर दिया कि जैसे कल वहां कुछ था ही नहीं , और हम अपनी निशानियां खोल-खोलकर बयान कर देते हैं उन लोगों के लिए जो सोचने समझने वाले हैं""
इस आयत में ज़िंदगी को एक खेती और फ़स़ल की मिस़ाल द्वारा समझाया गया है कि जब ज़िंदगी की फ़स़ल अपने पूरे शबाब पर आकर लहलहा रही हो और उससे फाएदा उठाने वाले यह समझने लगें कि अब हमारे मुक़ाबले में कोई नहीं , हम जैसा चाहें वैसा कर गुज़रने की पूरी त़ाक़त रखते हैं , और ज़मीन और उसके अंदर छुपे रहस्यों और ख़ज़ानों से जैसा चाहें फायदा उठा सकते हैं..
अब अगर हम ये कहें कि HAARP या EMP जैसी न जानें कितनी अदृश्य और रहस्यमय टेक्नॉलिजी हैं जिनके बारे में आम इंसान को क़तई इल्म ही नहीं और अगर किसी के पास है भी तो इतनी कम और मामूली कि अवाम की अक्सरीयत आसानी से हमें झुटला देगी या मजनूं और दीवाना कहते हुए अपनी राह लेगी..यानि साज़िश कहकर बात ख़त्म..अब अपनी राह पकड़ो..
कम से कम अहल-ईमान को यह बात शोभा ही नहीं देती कि वह दुश्मन की साज़िशी पहलुओं को मज़ाक़ या नासमझी में भी इंकार करे , क्योंकि साज़िशी थ्योरी की सबसे बड़ा गवाह ख़ुद क़ुरआन है और खोल खोलकर बाक़ाएदा इसकी तशहीर हुई है..अभी इंसान दुनिया में आया भी नहीं था कि जन्नत में ह़ज़रत आदम(अ०स०) और माई ह़व्वा के साथ सबसे बड़ी साज़िश इब्लीस ने कर डाली और उस पाक स़ाफ़ माहौल में भी उसने अल्लाह की ह़ुक्म-ए-अदूली करवा दी..
साज़िश को साज़िश बताने या मान लेने से ईमान किस तरह ख़तरे में पड़ जायेगा यह मंत़िक़ अभी भी मेरे लिए अबूझ पहेली है...और कुछ लोग इतने धड़ल्ले से इस जुमले को इस्तेमाल कर देते हैं जैसे उन्होंने ईमान का पैमाना ईजाद कर रखा हो?
जबकि इंसान की इस दुनिया में आमद ही एक साज़िश के तह़त हुई है..आदम(अ०स०) और माई ह़व्वा अच्छा ख़ास़ा जन्नत के माहौल का आनंद ले रहे थे , इब्लीस को जलन हुई उसने वहां से निकालने की साज़िश रच डाली..अब अगर इस साज़िश को बता देने से ईमान ख़तरे में पड़ जाता तो अल्लाह ने क़ुरआन में इसका प्रचार क्यों किया(?)नऊज़-बिल्लाह सुम्मा नऊज़ बिल्लाह ! क्या अल्लाह त'आला अपने बंदों का ईमान ख़त्म कर देना चाहता है??
और फिर अल्लाह ने इसी एक साज़िशी क़िस्से पर बस नहीं किया...उसने सूर: अल-आराफ़ में भी खोल खोलकर बयान कर दिया कि..
""ऐ बनी-आदम ऐसा ना हो कि शैतान तुम्हें फिर उसी फ़ित्ने में डाल दे जिस तरह उसने तुम्हारे वालदैन को जन्नत से निकलवाया था और उनके लिबास उन पर उतरवा दिए थे ताकि उनकी शरमगाहें एक दूसरे पर खोल दे..वह और उनके साथी तुम्हें ऐसी जगह से देख रहे हैं जहां से तुम उन्हें नहीं देख सकते"'
यहां भी क़िस़्स़ा तमाम नहीं हुआ...अल्लाह त'आला फिर तीसरी जगह बयान फरमाते हैं कि..
""उन्होंने अपनी तमाम चालें चलकर देख लीं मगर उनकी हर चाल का तोड़ अल्लाह के पास मौजूद था..जबकि उनकी चालें इतनी ख़तरनाक थीं कि पहाड़ भी अपनी जगह से टल जाता""(सूरः इब्राहीम)
इसी पहाड़ के टल जाने वाली बात पर ही ग़ौर कर लें..कि इब्लीस के पुजारियों की साज़िशें कितनी ख़तरनाक और गहरी हैं😳
अब कोई अगर क़ुरआन को भी रद् करते हुए यह कहे कि साज़िश़ो का ज़िक्र करने से ईमान ख़तरे में आ जाता है तो उसकी अक़्ल पर मातम के सिवा और क्या किया जा सकता है??
ख़ैर अब आगे बढ़ते हैं ! कोरोना को साज़िश मानना या इंकार कर देना हर इंसान का ज़ाती मसला है..लेकिन कोरोना को लेकर WHO के साथ साथ लगभग तमाम दुनिया की सरकारों ने जो रवैया अपना रखा है कि उससे साज़िश की बू आना लाज़मी है..और जिसे यह बू मह़सूस ना हो वह अपने नाक कान और आंख का किसी अच्छे त़बीब से इलाज करवाये..
यह जो प्रोग्राम ऑफ डेथ उर्फ़ कोरोना का हौवा खड़ा किया गया है इससे जानी नुक़स़ान तो उतना नहीं होना है , यह बात तो कोरोना के आक़ाओं के आंकड़े भी स़ाबित करते हैं...लेकिन जो आर्थिक अज़ाब मुसल्लत किया जायेगा उसका अंदाज़ा आप अभी से लगा सकते हैं..करोड़ों नौकरियां जा चुकीं , सार्वजनिक उपक्रम बेचने की होड़ लग चुकी है , हर तरफ अभी से बेरोज़गारी और हू का आलम है...
टिड्डी दल का ह़मला कोरोना से भी बड़ी इमरजेंसी है इसका नतीजा अभी नहीं आप अगले एक-दो सालों में मुलाह़ज़ा कीजिएगा...आपके पास ख़ोराक होगी ना खोराक ख़रीदने के लिए पैसा और स्रोत...और यह सिलसिला रूकना भी नहीं है , हर रोज़ नई नई शक्लें बदल कर आपका नात़क़ा बंद किया जायेगा..और इसमें हर ग़रीब बेबस-ओ-लाचार मरने को बेहतर समझने लगेगा ,
इंसानों द्वारा रची गई साज़िशों की माला टूट चुकी है , अब हर रोज़ आफतों और मुस़ीबतों का ज़ोर बढ़ेगा..चेहरे बदल बदल कर मौत और भूख का ह़मला चलता रहेगा..
अगर आप कहेंगे कि अल्लाह बहुत बड़ा और कारसाज़ है तो मैं दो क़दम आगे बढ़कर कहूंगा कि बेशक मेरा रब मुसब्बब-उल-असबाब और ख़ैरुल-माकरीन है , लेकिन उसने दुनिया के लिए जो मुक़द्दर कर दिया है उसे भी ज़रूर बिल-ज़रूर पूरा करवायेगा..और वह भी इसी इंसान के हाथों क्योंकि इंसान को जो भी तकलीफ़ पहुंचती है वह उसके अपने हाथों की कमाई होती है...अल्लाह कोई इल्ज़ाम अपने सर पे नहीं लेता...
मुझे नहीं मालूम इस दुनिया की तख़लीक़ कब हुई , साइंस की साइंस वाले जानें..लेकिन इतना ज़रूर पता है कि आदम(अ०स०) के साथ ही इब्लीस का किरदार वजूद में आ गया यानि अहल-ईमान और साज़िश का साथ चोली दामन का रहा है , साज़िशें होती रहीं लेकिन अल्लाह की तदबीर से अहल-ईमान सुर्ख़रू होते रहे और यह सिलसिला क़यामत तक चलेगा..हालांकि साज़िशें अहल-ह़क़ की क़ुर्बानियां भी मांगती हैं लेकिन ह़क़ ज़िंदा रहा है और ज़िंदा रहेगा..
हम अल-ह़मदोलिल्लाह मुसलमान हैं और हमारा रब बहुत करीम है..वह क़ह्हार भी है जब्बार भी , यह हमारे रब का अज़ाब नहीं , मेरे रब का अज़ाब लॉकडाउन लगाकर रोका नहीं जा सकता..जब मेरे रब का अज़ाब आता है तो इंसानी समझ और अक़्ल से ऊपर का खेल होता है...वहां गेम ओवर वाला ह़ुक्म होता है , जिसके बाद न मोहलत मिलती है ना चुहलबाज़ी चलती है..
एक ह़रामी जिसे दुनिया में अभी फित्ना-ए-अज़ीम बपा करने आना है उसके फॉलोवर दुनिया की हर पोज़ीशन ऑफ पॉवर से उस फर्जी ख़ुदा के आने की राह हमवार कर रहे हैं...
भूख , ख़ौफ़ , ज़िल्लत , बेबसी लाचारी में घिर चुके कच्चे पक्के लोग पके आम की तरह उसकी झोली में गिरेंगे , उसके आने के पहले तीन सालों में क़हत की शिद्दत होगी..
आख़िर कोई जवाब देगा(?)कि WHO के बजाय यूनीवर्सिटी से डॉप आउट नॉन मेडिकल स्टूडेंट "बिल गेट्स" महामारी फैलने से तीन साल पहले महामारी और वैक्सीन पर आखिर इतने यक़ीन से कैसे बात कर लेता है??क्या दुनिया के सारे मेडिकल एक्सपर्ट और डॉक्टर मर गए हैं??
यह बात स्पष्ट है कि सबसे अधिक जानी नुक़्स़ान अमेरिका में हुआ है , जी हां ! अमेरिका इतना संगठित और त़ाक़तवर मुल्क है कि उसने पिछले चार दशकों से अपना वर्ल्ड ऑर्डर सारी दुनिया पर क़ाएम कर रखा है...अगर वह चाहता तो इस महामारी से चाइना और न्यूज़ीलैंड से बेहतर त़रीके से निपट सकता था...अगर चाहता तो??
आने वाले दौर में अमेरिका का पतन स्क्रिप्टेड है , वह ख़ुदकशी कर रहा है..और यह सब करवाने वाली वह अदृश्य ताक़तें हैं जिनके आप हाथ तो देख समझ सकते हैं लेकिन चेहरा हमारे और आपके बीच होते हुए भी ओझल है...जिसकी हमें समझ नहीं..
अमेरिका पहले दिन से ही इज़्राईल का पिट्ठू रहा है , ग्रेट ब्रिटेन का ग्लोबल पॉवर स्टेटस अमेरिका शिफ्ट हुआ था , और अब अमेरिका से कहीं और शिफ्ट होने जा रहा है और यह काम वही लोग बड़े संगठित और सोचे समझे अंदाज़ में अंजाम दे रहे हैं जिन्होंने अमेरिका को सुपर पॉवर बनाया था...
ऐसे ही दौर के लिए अल्लाह के रसूल(स०अ०व०) हमें यह दुआ सिखा गये...
अल्लहुम्मा नऊज़-बिका मिन अज़ाब-अल-क़ब्र व मिन अज़ाब-अल-नार व फित्नातुल-ह़यात वल ममात व फित्नातुल-मसीह़ अल-दज्जाल(अरबी में इस दुआ को याद करें क्योंकि हिंदी लिखने में ज़ेर ज़बर की ग़लती हो सकती है)
ह़ालात-ए-ह़ाज़रा पर इससे बेहतरीन अगर कोई दुआ हो सकती है तो बताइए..??
नमाज़ क़ाएम करिए , उन नमाज़ों में यह दुआ पढ़िए और चौड़े हो जाइए...आज़माइश सख़्त ज़रूर है लेकिन हम इनशा-अल्लाह अज़ाब-ए-इलाही का शिकार नहीं हैं..बल्कि हम अपने करीम रब को मानने वाले हैं , जिस रब ने हमें अभी तक अमन , सेह़त और खुराक की फरावानी कर रखी है उसकी शुक्रगुज़ारी में मज़ीद बढ़ोत्तरी कर दें , गुनाहों को छोड़ दें और फित्ना-ए-दज्जाल का ईमान ओ यक़ीन के साथ निडर होकर सामना करें , कि ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता अगर मर गए तो अफ़ज़ल शहीद में गिंती है और अगर ज़िंदा रहे तो बेहतरीन ग़ाज़ी कहलाये़गे...
मैं यह नहीं कह रहा कि आप बीमारी और वायरस से लापरवाह हो जायें , मुकम्मल एह़्तेयात बरतें , मेडिकल साइंस त़रीक़े पर इलाज करवाएं ,
लेकिन यह याद रखें कि हम तलबीस इब्लीस के दौर में हैं , हर चीज़ को ख़ूब ठोंक बजाकर जांचें परखें , और मीडिया या मेजॉरिटी ओपीनियन के पीछे अंधे होकर मत भागें..
याद रखें कि...इस दौर का हर सच्चा और अमीन शख़्स झूटा और हर झूटा अस़ल में सच्चा कहलायेगा , उसकी जन्नत , दोज़ख़ और जहन्नम , जन्नत होगी...
किसी भी मामले में पॉपुलर ओपीनियन के भ्रमजाल मे मत आयें...सब स्क्रिप्टेड इवेंट्स हैं और कंट्रोल्ड मीडिया का मायाजाल...
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