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Showing posts from July, 2024

करबला दोस्ती सिखाती है।

जो किसी रोज़ इज़रायली आकर कहें, "ग़ज़ा के बच्चों को क्यों रोते हो, वो सब तो शहीद हैं?" जो किसी रोज़ कोई दक्षिणपंथी सवाल करे "लिंचिंग में मरने वाले का मलाल कैसा? शहादत तो तुम्हारी विरासत है?" जो कोई दंगाई, या फर्ज़ी एन्काउन्टर स्पेशलिस्ट आकर कह दे, "मौत बरहक़ है, भला ये रोना-पीटना किस बात का? जवाब क्या होगा?  ज़ाहिर है, हम कहेंगे मरने वाले को नहीं रोते हैं, ज़ुल्म को रो रहे हैं? क्या हम नहीं समझते कि शहीद का रोना है या नाइंसाफी का? मरसिया मौत का है या नाहक़ ज़्यादती का?  बस जिस दिन ये बात दिल में बैठ जाए कि छह महीने के बच्चों का सिन शहादत समझने के लिए नहीं होते है इसलिए जंग में बच्चे क़त्ल नहीं किए जाते। जब ये यक़ीन हो जाए कि क़ुर्बानी के जानवर के भी हक़ूक़ हैं, उसे भूखा, प्यासा ज़िबह नहीं किया जाता तो फिर इंसान को ऐसे आलम में कैसे मारा जा सकता है। जब दिल ये तस्लीम कर ले कि कमज़ोर से कमज़ोर शख़्स के घर की बहू-बेटियों की भी इज़्ज़त है, किसी के घर की नामूस बाज़ारों में बेपर्दा नहीं फिराई जातीं। बस उसी रोज़ दिल नर्म हो जाते हैं और आंखें नम होना सीख जाती हैं।  जब ये...

कर्बला क्या सिखाती है?.

ज़ुहैर इब्ने क़ैन अल बजली कूफा के संभ्रांत लोगों में गिने जाते थे। पेशे से व्यापारी थे और उस वक़्त के अक़ीदे के लिहाज़ से उस्मानी। उस्मानी, यानी वो लोग जो मानते थे कि अली इब्ने अबु तालिब ने अपने से पहले ख़लीफा रहे उस्मान बिन अफ्फन के हत्यारों के साथ ढीलाई बरती और इंसाफ नहीं किया। बहरहाल, ज़ुहैर हज करके लौट रहे थे। रास्ते में उनका क़ाफिला एक जगह ठहरा। उनसे कुछ ही दूरी पर हुसैन इब्ने अली के परिवार के ख़ेमे लगे थे। हुसैन हज अधूरा छोड़कर कूफा की तरफ निकले थे। अपने भाई मुहम्मद ए हनफिया को लिखे एक पैग़ाम में उन्होंने कहा कि मैं नहीं चाहता कि मक्का या मदीना की ज़मीन पर ख़ूंरेज़ी हो और ये इल्ज़ाम मेरे सिर आए। बहरहाल, इमाम हुसैन ने अपने साथियों से ज़ुहैर के क़ाफिले के बारे में दरयाफ्त किया। उन्होंने पता करके बताया कि, कूफे का कोई मौअतबर शख़्स है, हज करके लौट रहा है। इमाम हुसैन ने अपने भाई अब्बास इब्ने अली को बुलाया और कहा कि उस क़ाफिले के सालार के पास जाएं और उनसे कहें कि हुसैन बिन अली आपसे मिलना चाहते हैं।  अब्बास बिन अली भाई का पैग़ाम लेकर पहुंचे। ज़ुहैर ने उनसे नाम-पता पूछा और आने का मक़...

करबला क्या सिखाती है?

कर्बला में ख़ुद इमाम हुसैन के अलावा कम से कम छह सहाबिए रसूल इमामे आली मक़ाम की नुसरत में शहीद हुए हैं। इनमें हबीब इब्ने मज़ाहिर अल-असदी, मुस्लिम इब्ने औसजा अल असदी, अनस बिन हारिस अल कहिली, अब्दुल रहमान इब्ने अब्द रब अल अंसारी, अब्दुल्लाह इब्ने यक़तर अल हिमायरी, किनाना बिन अतीक़ अल तबलाग़ी, अम्मार बिन अबि सलामा अल दलानी अल हमदानी प्रमुख हैं। ये सभी कूफा शहर के वासी हैं। इसी कूफा शहर में और भी कई सहाबी और ताबइन हैं। इनमें कर्बला से पहले कम से कम दो मुस्लिम इब्ने अक़ील के साथ शहीद हुए और बग़ावत के इल्ज़ाम में क़रीब दर्जन भर गिरफ्तार कर लिए गए। बाक़ी ख़ौफज़दा होकर घरों में बैठ गए। नबी ए करीम के सहाबियों में दो ऐसे भी हैं जिनके सिर क़त्ले हुसैन में शरीक होने का गुनाह है। एक, अब्दुर रहमान बिन अब्ज़ा अल क़ुज़ाई और अबु अब्दुल क़ुद्दूस शबस बिन रिबी अल तमीमी। ये दोनों इब्ने ज़ियाद के लश्कर में हैं और क़त्ले हुसैन में पेश-पेश हैं। इन दोनों से मंसूब कई हदीस सही ए सित्ता में दर्ज हैं। इनमें अनस बिन हारिस का मसला बड़ा दिलचस्प है। वो मुहद्दिस हैं बद्र के ज़माने के सहाबी हैं। अनस बद्र और हुनैन की जंग ...

करबला क्या सिखाती है?

इमाम हुसैन को मदीना छोड़कर मक्का क्यों जाना पड़ा? मक्का से अपना हज अधूरा छोड़कर कूफा की तरफ क्यों निकलना पड़ा? क्यों मुस्लिम इब्ने अक़ील की शहादत और कूफे की अवाम के अपनी बैयत से पलट जाने की ख़बर पाकर भी इमामे आली मक़ाम रास्ते से वापस नहीं लौटे? जब सब लोग बता रहे थे कि कूफा के अवाम भरोसे लायक़ नहीं हैं तो क्या इमाम हुसैन इतने भोले थे उन्हें इसकी ख़बर न थी?  ऐसे बहुत से सवाल हैं जो हमसे अकसर पूछे जाते हैं। इसका पहला जवाब है, इमाम हुसैन न किसी ख़ुशफहमी में थे और न किसी धोखे में। न ही वो मदीना से सीधा कूफा या कर्बला गए। बेशक इमाम हुसैन हर हालात से आगाह थे। उन्होंने आगाही के हालात में मौत का रास्ता चुना क्योंकि उन हालात में ज़िंदा रहना ज़िल्लत का सबब था। हालात का अंदाज़ा उन्हें उसी रात हो गया जब मदीना में यज़ीद के गर्वनर वलीद इब्ने उत्बा इब्ने अबु सूफियान और मरवान इब्ने हाकम ने उनसे बैयत का मुतालबा किया। उसी रात उन्होंने मदीना छोड़ दिया और मक्का पहुंचे जहां लगभग चार महीने रहे। लेकिन हज के दौरान यज़ीद के जासूस देखकर वो समझ गए कि मरना ही है। इससे घर में क़त्ल होने के बजाय लड़कर मरा जाए। ख...

इस्लाम में औरतों की असल भूमिका (करबला क्या सिखाती है?)

इस्लाम में औरतों की असल भूमिका समझनी है तो कर्बला ज़रूर पढ़नी चाहिए। कर्बला में ज़ैनब बिन्ते अली, उम्मे कुलसूम बिन्ते अली, उम्मे वहब बिन्ते अब्दुल्लाह, और उम्मे वहाब का किरदार बेहद अहम है, जबकि कर्बला के बाद उम्मुल मौमिनीन उम्मे सलमा यानी हिंद बिन्ते अबी उमैया उम्मुल बनीन यानी फातिमा बिन्ते हुज़ाम का ज़िक्र ज़रुरी है। कर्बला में ख़वातीन की अहमियत इससे समझिए कि अगर ज़ैनब बिन्ते अली, उम्मे कुलसूम बिन्ते अली न होतीं तो शायद कर्बला का ज़िक्र भी हम तक न पहुंच पाता। इमाम हुसैन को घर से दूर, मानवीय आबादियों से परे, जंगल में घेरकर मार दिया गया। उस ज़माने में टीवी, अख़बार, या संचार का कोई ऐसा माध्यम न था कि इस घटना की ख़बर किसी और तक भी पहुंच पाती। इमाम हुसैन जिस वक़्त क़त्ल किए गए वो अपने शहर मदीने से तक़रीबन 1300 किलोमीटर दूर थे जबकि उनकी मंज़िल कूफा के लिए वहां से लगभग सौ किलोमीटर का सफर बाक़ी था। ये उस ज़माने की बात है जब न सड़कें थीं और न टेलीफोन। ऊंट और घोड़ों के सिवा सफर करने का का कोई दूसरा तरीक़ा न था। ऐसे में भला किसको पता चलता कि कर्बला में आख़िर हुआ क्या है? हम तक कर्बला का जितना भी...

कर्बला क्या सिखाती है?

कर्बला के तमाम सबक़ हमने पढ़े। लेकिन इन सबसे बढ़कर समाजियात और सियासत के कुछ अहम सबक़ भी कर्बला हमें सिखाती है।  इनमें एक है, अपने बचपन के दोस्तों और पुराने साथियों पर यक़ीन रखिए, वो मौत के दरवाज़े पर भी आपके साथ खड़े होते हैं। दूसरा, अपने बच्चों को हक़ और नाहक़ की तमीज़ सिखा दीजिए, वो आपकी हर अपेक्षा पर खरे उतरते हैं। तीसरा, मध्यम वर्ग के भरोसे कभी मत रहिए। ये वर्ग हमेशा अपने गुणा-भाग के हिसाब से फैसले लेता है। चौथा, अपने पुश्तैनी दुश्मन से भले की उम्मीद मत रखिए। वो मौक़ा लगते ही चोट देता है। और पांचवा सबक़ है, किसी भी हाल में हौंसला मत खोइए। अंत में आपकी उपलब्धियां नहीं बल्कि आपके संघर्ष याद रखे जाते हैं। कर्बला कह रही है कि आपके साथी अगर हबीब, मुस्लिम, सइद, शबीब, जौन और बुरैर जैसे हों, भाई अब्बास और मुस्लिम जैसे, भतीजे क़ासिम,भांजे औन-मुहम्मद जैसे और बेटे अली अकबर जैसे हों तो फिर मौत भी मलाल का सबब नहीं बन सकती।  इसे ऐसे समझिए, शबे आशूर अली अकबर ने इमाम हुसैन से सवाल किया, बाबा क्या हम हक़ पर हैं? हां में जवाब मिला तो उन्होंने कहा कि बस बाबा, अब मौत हमसे आ मिले या हम मौत से...