करबला दोस्ती सिखाती है।
जो किसी रोज़ इज़रायली आकर कहें, "ग़ज़ा के बच्चों को क्यों रोते हो, वो सब तो शहीद हैं?" जो किसी रोज़ कोई दक्षिणपंथी सवाल करे "लिंचिंग में मरने वाले का मलाल कैसा? शहादत तो तुम्हारी विरासत है?" जो कोई दंगाई, या फर्ज़ी एन्काउन्टर स्पेशलिस्ट आकर कह दे, "मौत बरहक़ है, भला ये रोना-पीटना किस बात का? जवाब क्या होगा? ज़ाहिर है, हम कहेंगे मरने वाले को नहीं रोते हैं, ज़ुल्म को रो रहे हैं? क्या हम नहीं समझते कि शहीद का रोना है या नाइंसाफी का? मरसिया मौत का है या नाहक़ ज़्यादती का? बस जिस दिन ये बात दिल में बैठ जाए कि छह महीने के बच्चों का सिन शहादत समझने के लिए नहीं होते है इसलिए जंग में बच्चे क़त्ल नहीं किए जाते। जब ये यक़ीन हो जाए कि क़ुर्बानी के जानवर के भी हक़ूक़ हैं, उसे भूखा, प्यासा ज़िबह नहीं किया जाता तो फिर इंसान को ऐसे आलम में कैसे मारा जा सकता है। जब दिल ये तस्लीम कर ले कि कमज़ोर से कमज़ोर शख़्स के घर की बहू-बेटियों की भी इज़्ज़त है, किसी के घर की नामूस बाज़ारों में बेपर्दा नहीं फिराई जातीं। बस उसी रोज़ दिल नर्म हो जाते हैं और आंखें नम होना सीख जाती हैं। जब ये...