इस्लाम में औरतों की असल भूमिका (करबला क्या सिखाती है?)

इस्लाम में औरतों की असल भूमिका समझनी है तो कर्बला ज़रूर पढ़नी चाहिए। कर्बला में ज़ैनब बिन्ते अली, उम्मे कुलसूम बिन्ते अली, उम्मे वहब बिन्ते अब्दुल्लाह, और उम्मे वहाब का किरदार बेहद अहम है, जबकि कर्बला के बाद उम्मुल मौमिनीन उम्मे सलमा यानी हिंद बिन्ते अबी उमैया उम्मुल बनीन यानी फातिमा बिन्ते हुज़ाम का ज़िक्र ज़रुरी है। कर्बला में ख़वातीन की अहमियत इससे समझिए कि अगर ज़ैनब बिन्ते अली, उम्मे कुलसूम बिन्ते अली न होतीं तो शायद कर्बला का ज़िक्र भी हम तक न पहुंच पाता।
इमाम हुसैन को घर से दूर, मानवीय आबादियों से परे, जंगल में घेरकर मार दिया गया। उस ज़माने में टीवी, अख़बार, या संचार का कोई ऐसा माध्यम न था कि इस घटना की ख़बर किसी और तक भी पहुंच पाती। इमाम हुसैन जिस वक़्त क़त्ल किए गए वो अपने शहर मदीने से तक़रीबन 1300 किलोमीटर दूर थे जबकि उनकी मंज़िल कूफा के लिए वहां से लगभग सौ किलोमीटर का सफर बाक़ी था। ये उस ज़माने की बात है जब न सड़कें थीं और न टेलीफोन। ऊंट और घोड़ों के सिवा सफर करने का का कोई दूसरा तरीक़ा न था। ऐसे में भला किसको पता चलता कि कर्बला में आख़िर हुआ क्या है? हम तक कर्बला का जितना भी ज़िक्र पहुंचा है उसके तीन अहम स्रोत हैं। एक कर्बला में ज़िंदा बच गए हुसैन इब्ने अली के परिवार के बच्चे और औरतें। दूसरा अबु मक़नाफ का मक़तल, और तीसरा हमीद (हुमैद) इब्ने मुस्लिम जैसे यज़ीद के सिपाही जो रोज़नामचा लिख रहे थे। अबु मक़नाफ ने उन लोगों का बताया वर्णन लिखा जो ख़ुद या जिनके परिजन क़त्ले इमाम हुसैन में शामिल थे।
ज़ाहिर है, इमाम हुसैन के परिजनों के अलावा कर्बला के बाक़ी तमाम वर्णन विजेता की ज़बानी हैं। इनमें जीत का दंभ, क़त्ल करने की शेख़ी और ज़ुल्म करने के तरीक़े बयान किए गए हैं। कर्बला के पीड़ितों का तो भी थोड़ा बहुत ज़िक्र हम तक पहुंचा है वो कर्बला में मौजूद इमाम हुसैन की दो बहनों से आया है। कर्बला में ज़िंदा बचे मर्दों में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अली इब्ने हुसैन अल सज्जाद) और इमाम मौहम्मद बाक़िर प्रमुख हैं लेकिन जंग के वक़्त इमाम ज़ैनुल आबेदीन बीमार थे और इमाम बाक़िर की उम्र तक़रीबन दो से तीन साल थी। ऐसे में इन दोनों ने भी कर्बला के बारे में उतना ही तज़किरा किया है जो उनके परिवार की बची हुई महिलाओं ने उनको बता दिया। इसमें उनके सौतेले भाइयों अली अकबर की मां उम्मे लैला और अली असग़र की मां उम्मे रबाब की रुदाद शामिल हैं।
बहरहाल, कर्बला की जंग में जान क़ुर्बान करने वालों में महिला भी शामिल हैं। इनमें उम्मे वहब बिन्ते अब्दुल्लाह प्रमुख हैं। जब उनके शौहर को यज़ीद के सिपाही घेरकर क़त्ल कर रहे थे तब ये ख़ेमे की क़नात लेकर उनसे भिड़ गईं। इसी बीच किसी दुश्मन सिपाही ने वार किया और वो अपने शौहर के साथ ही शहीद हो गईं। इसी कर्बला के मैदान में वहबे क़लबी अपनी बीवी और मां के साथ पहुंचे थे। वो ईसाई थे और कूफा में किसी सराय में ठहरे हुए थे। उन्होंने सुना कि ये लोग नबी के नवासे को क़त्ल करने पर आमादा हैं तो ग़ैरत जाग गई और कर्बला आ गए। दुश्मन फौज के सालार शिम्र ने वहब के क़त्ल करके उनके सिर इमाम हुसैन की सेना की तरफ उछाल दिया। वहब की मां पीछे लगे ख़ेमों से ये मंज़र देख रही थीं। वो ख़ेमों से निकलकर मक़तल में आ गईं। उन्होंने अपने बेटे का सिर उठाया और वापस शिम्र की तरफ उछाल दिया। उन्होंने कहा कि “जो चीज़ सदक़ा कर दी जाती हैं वापस नहीं ली जातीं।”
शायद ही कोई मां अपने बेटे का कटा सिर देखकर इस तरह का हौंसला दिखा पाए। लेकिन ये कर्बला की मांएं हैं। शबे आशूर इनकी बहादुरी की गवाह है। जब मौत दरवाज़े पर खड़ी थी तो ये माएं अपने बच्चों को जंग की लोरियां सुना रही थीं। अपने बच्चों को समझा रही थीं कि अगली सुबह इमाम हुसैन की नुसरत में कैसे सिर कटाना है। इनमें उम्मे फरवा, उम्मे लैला, रबाब, रमला, और ज़ैनब बिन्ते अली के नाम प्रमुख हैं। कर्बला की जंग के बाद जंग के बाद दुश्मन फौज ने इमाम हुसैन के ख़ेमों में आग लगा दी और उनका तमाम माल-असबाब लूट लिया। चूंकी इमाम ज़ैनुल आबेदीन बीमार थे सो ज़ैनब बिन्ते अली के सिवा कोई ऐसा समझदार न था जो परिवार को संभाले।
हालांकि कर्बला की जंग में ज़ैनब बिन्ते अली ने भाइयों, भतीजों के अलावा अपने दो बेटे औन और मुहम्मद की भी क़ुर्बानी दी थी। दिन भर में सारे परिवार को गंवा देने के सदमे में थीं। लेकिन जब ख़ेमों में आग लगी तो लोगों ने देखा कि एक ख़वातीन है जो आग में से एक जिस्म को ख़ीच कर निकाल रही है। ये ज़ैनब बिन्ते अली थीं जो अपने बीमार भतीजे को आग से बचा कर लाईं। इसके अलावा भी उन्होंने कई बच्चों की जान बचाई। जब दुश्मन चले गए तो ज़ैनब बिन्ते अली ने औरतों और बच्चों को इकट्ठा किया। वही सबको दिलासा दे रही थीं।
अगले रोज़ इमाम हुसैन के साथियों के कटे हुए सिरों और ज़िंदा बच गए परिजनों को क़ैदी बनाकर इब्ने ज़ियाद के सामने कूफा लाया गया। इनमें इमाम ज़ैनुल आबेदीन के अलावा तक़रीबन दो दर्जन औरतें और बच्चे थे। इब्ने ज़ियाद ने इमाम सज्जाद को क़त्ल कराने की कोशिश की। यहां भी ज़ैनब बिन्ते अली उनकी ढाल बनकर खड़ी हो गईं। इसके बाद क़ैदियों को यज़ीद के सामने पेश होने के लिए दमिश्क भेज दिया गया। यह क़ाफिला जहां-जहां रुकता वहां ज़ैनब और उम्मे कुलसूम मौक़ा मिलते ही लोगों को संबोधित करतीं। उन्हें बतातीं कि कर्बला में नबी ए करीम (सअ) के परिजनों के साथ हाकिम ने क्या सुलूक़ किया है। इसका लोगों के दिलो दिमाग़ पर गहरा असर हुआ। कुछ ही दिन बाद जगह-जगह बग़ावतें होने लगीं। नबी के नवासे के क़त्ल की ख़बर जैसे-जैसे फैलती गई लोगों में ग़ुस्सा बढ़ता गया।
यज़ीद के दरबार में ज़ैनब बिन्ते अली का ख़ुत्बा तारीख़ का शाहकार है। यज़ीद ने दरबार में मौजूद लोगों से कहा था ये बाग़ी थे, क़त्ल कर दिए गए। उसने कहा कि आज बद्रो हुनैन के उसके शहीद ज़िंदा होते को देखते कि बनु हाशिम से उनकी मौत का उसने क्या ख़ूब बदला लिया है। साथ ही यज़ीद ने दावा किया कि यक़ीनन अल्लाह इज़्ज़त और ज़िल्लत का देने वाला है। उसके दुश्मन ज़ेर हुए और वो कामयाब हुआ।
इस पर अली की बेटी ने मौजूद लोगों से कहा कि बाग़ी नहीं थे, उस नबी के दिल के टुकड़े थे जिसके नाम पर ये हुकूमत कर रहा है। यज़ीद से मुख़ातिब होकर उन्होंने कहा कि ये यक़ीनन हमारा इम्तेहान है कि नबी के अज़ीज को क़ैद में रहें और आज़ादकर्दा ग़ुलामों के बच्चे उनका मज़ाक़ उड़ाएं। उन्होंने आगे कहा कि हमें इस हाल में पहुंचाकर ये न समझ कि तू कामयाब हुआ। उन्होंने सूरह आले इमरान की 178वीं आयत पढ़कर कहा ख़ुदा गुनहगारों की रस्सी ढीली छोड़ देता है लेकिन उनकी सज़ा मुअइय्यन है। बहरहाल, ज़ैनब बिन्ते अली के ख़ुत्बों का ही असर था कि यज़ीद कर्बला के बाद तक़रीबन तीन साल भी हुकूमत नहीं कर पाया। पागल होकर मरने से पहले उसके ख़िलाफ जगह-जगह बग़ावत हुईं और अगले कुछ साल में दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ताक़तवर हुकूमत बिखर गई। आज यज़ीद की नस्ल में शायद ही कोई ज़िन्दा हो।
इसी तरह उम्मे कुलसूम बिन्ते अली ने भी कूफा से शाम और शाम से मदीना वापसी के रास्ते में जगह-जगह लोगों को संबोधित किया। उन्हें बताया कि कर्बला में आख़िर हुआ क्या है। जब यह लोग तक़रीबन साल भर बाद घर लौटकर आए तो उन्होंने कर्बला की दास्तान मदीने के बाशिंदो बताई। मदीने में कर्बला की दास्तान सुनाने का दस्तूर बन गया। घर-घर ज़िक्रे हुसैन था। इस ज़िक्र को घर-घर की दास्तान बनाने में उम्मुल बनीन और उम्मुल मौमीनीन उम्मे सलमा का बेहद अहम रोल है। उम्मुल बनीन के चार बेटे अब्बास, जाफर, उसमान और अब्दुल्लाह शामिल थे। लेकिन उनके तब्सरे में हुसैन के ग़म के सिवा किसी ने कुछ न सुना। यक़ीनन ये औरतें न होतीं तो कर्बला की दास्तान इराक़ के बीहड़ों और विजेताओं के रोज़नामचों में दफ्न होकर रह जाती। इन ख़वातीन का अहसान है हमपर कि हम वो सब सुन पाए जिसको उस दौर की हूकूमत बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि कोई सुन पाए।
हालांकि कर्बला में महिलाओं की इस भूमिका पर बहुत सारे लोग हैरत जताते हैं। मगर वो भूल जाते हैं इस्लाम में महिलाओं का हिस्सा न हो तो हर उपलब्धि अधूरी है। ज़ैनब बिन्ते अली की नानी जनाबे ख़दीजा नबी ए करीम की सदा पर लब्बैक कहने वाली इस दुनिया की पहली फर्द हैं। ख़दीजा न सिर्फ कलमा पढ़ने वाली पहली मुसलमान हैं बल्कि उनकी दौलत, और उनकी ताक़त को निकाल दें तो शुरुआती दौर में इस्लाम का हाल बस सोचा जा सकता है। जिस दौर में तमाम अहले मक्का मुसलमानों का बहिष्कार कर रहे थे उस काल में हज़रत ख़दीजा ने अपना सबकुछ इस्लाम के नाम कर दिया। इसी तरफ नबी की बेटी फातेमा ज़हरा ख़ुद में हिम्मत, पाकीज़गी, और क़ाबिलियत की मिसाल हैं। ऐसे में अगर अली की बेटियों को फातहे कूफा और शाम कहा जाए तो भला हैरत कैसी?
कुल मिलाकर कर्बला के सैकड़ों दर्स हैं। उनमें एक यह भी है कि घर की औरतें क़ाबिल हों, हिम्मतवाली हों, और अच्छे-बुरे की तमीज़ रखती हों, और हर हालात का सामना करना जानती हों तो वो आपकी ताक़त हैं। अच्छी निस्वां न सिर्फ घर बनाती हैं बल्कि एक मज़बूत मुआशरे की नींव हैं।

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